शब्द-मित्र

गुरुवार, 5 मार्च 2026

कविता का पाठ यानी पढ़ना और सुनाना



छोटे-से सभागृह में बैठे श्रोता सौंदर्य के अद्भुत लोक में तन्मय थे। वे कुछ शिक्षक थे, कुछ कविता-पारखी; इलाही गण थे जो कविता से लोहवा अनाभ्यस्त थे। बहुतों ने ऐसी कविता पढ़ी थी, जो चांदों और तुकों का प्रयोग न हो, इसके बाद अपनी अनपहचानी-सी लय हो, और जो एकबारगी कविता ही न जान खराब हो, फिर भी मुग्ध भाव से उनके जादू की गिरफ़्त में हो। दिनेश कुशवाह अपनी कविताएँ सुन रहे थे। श्रोता विस्मय से अंतिम सुन रहे थे। पंक्तिबद्ध मॉडल के मुख से नि:सृत हो रही थी। पढ़ो वह नहीं रहे थे, सुना रहे थे। उन्होंने लिखी हुई कविताएँ थीं, लेकिन पढ़ी नहीं जा रही थीं। कवि के हाथ में लिखित पाठ नहीं था। अंदर से जैसे रस रस अपने-अपने कंठ से झर रहा था। वाचिक का वैभव उत्कर्ष पर था। यह धारणा देखते-देखते टूटती रही थी कि आधुनिक कविता मूलत: पाठ्य कविता है, वह सुगठित-लिखित पाठ में बंधी है। कविताएँ सीधे स्मृति-कोश से बाहर आ रही हैं। पढ़ने वाली कविता अब पढ़ने वाली कविता बन गई थी।

 पाठ को लिखित-मुद्रित की लिपिबद्ध बंदियों से, मुक्त कर देना हंसी-ना में था। अनादि श्रोता भी उसे लेकर मर्म तक पहुंच पा रहे थे। उनका आनंद उनकी मुखाकृति से झलक रहा था। 

 तीसरी कविता ने एक और कविता लिखी—'डॉ. 'विश्वरात्रि का खाना'। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे में नष्ट होने लगी। पाठ्य भी अनोखा। कविता में कहा गया है कि भोजन करना आत्ममग्न होकर आनंद-प्राप्ति की क्रिया है। इसमें रस का स्रोत सामने आया था। उनके पेज में सौन्दर्य-ग्रन्थ की सलिका भी थी। प्रशंसा के बिना स्वाद कैसा! गुण हैं तो गुणग्राहक भी हैं—रस है तो रसग्राही भी। रसमुग्धनाथनाथजी की कल्पना करें रसमग्न स्त्रोत। कविता में रस की कहानियाँ काव्यवाद के समतुल्य बता रही हैं। रसास्वाद और काव्यवाद की समतुल्यता में भरतमुनि की याद और सहजता है जो उन्हें ब्रह्मानंद-सहोदर शिष्य कहते हैं। कविता उन्हें भी याद कर रही थी। कवि की विदग्धता चरम पर थी- अनादि पिशाचिनी में भी विद्या ही विदग्धता संचरित होती है। फिर गयी अंतिम पंक्तियाँ तो जैसे बेहद ताक़तवर पंचलाइन बन गयीं—रसोड्रेक को पूरी तरह से अंतिम पंक्ति तक ले गयीं : 



'बाबा किसी गरीब बाभन के बेटे बचे/अन्यथा अमीरों में पले हुए/किसी भी आदमी की जीभ पर/नहीं चढ़े अन्नमातृ का ऐसा स्वाद/उनके खाने की तुलना गरीब मजदूर या/हलवे की, खेत पर पैसे वाली/भूख से ही जा सकते हैं/अन्यथा पास के विकल्प हैं स्वाद के/वे नहीं जानते भूख का स्वाद।'



यह अद्भुत कविता थी। अनोखा पाठ और उसका प्रभाव। यह देखना सुखद था कि कविता का पाठ भी नाटकीय कला की तरह मनोहारी हो सकता है। 

दिनेश कुशवाह ने लिखित-मुद्रित कविता और वाचिक खण्ड का भेद लगभग निरर्थक बनाया था। कविता का ऐसा असवाद शांत था। विश्वनाथजी भोजन-रस का जो असवाद जिह्वा से ले रहे थे चित्रित, कविता में उसे श्रोता ग्रहण से ग्रहण कर रहे थे। उसका प्रवाह युक्त तरल भाषा अंदर मोटी जा रही थी, बल्कि भाषा ही तरल पदार्थ प्रवाहित थी। शोध के अंत में यह नहीं कहा गया कि यह वाचिक मास्टर्स का तरलता था जबकि दिनेश कुशवाह की कविता तो प्रारूप में लिखी गई थी। वह सहज है, वह सहज में ही वाचिक में रूपान्तरित को पर्युत्सुक भाषा थी। यह दिनेश कुशवाह की नाव का नैसर्गिक गुण है। 

दिनेश कुशवाह की काव्यभाषा क्रिस्टलीय भाषा नहीं है, जिसमें कहीं की काव्यात्मक कविताएँ लिखी हुई हैं। वह लिखित-मुद्रित भाषा की होल्डिंग कंपनी में जमा नहीं हुई है। लेकिन वह लोक-कविता की तरह अपरिष्कृत और अनायास स्फूर्ति भी नहीं है। लोकभाषा की लय शामिल हो गई है। उसकी दो किताबों की ओर एक दृष्टि में ही ध्यान दिया जाता है—एक सांस में पढ़ने जा सकने वाले सरल वाक्य और लड़की विशेषण विकसन भिक्षु। इन लोकभाषाओं के गुण लिखित भाषा में शामिल हैं, जिनमें से एक का जतन उन्होंने किया है। लोकभाषा के काव्य में कवि के अनुभव-ज्ञान की पद्धति और उसके नैसर्गिक गीत स्वयमेव का अवलोकन शामिल है। साधुभाषा का कड़वी कोयला भंडार उसकी भव्यता सेंध लगाता है और धीरे-धीरे-से स्वयं को जोड़ता है। स्पष्ट है कि दिनेश कुशवाह जिस काव्यानुभव को रचते हैं, गुणात्मक रूप से वह लोक-अनुभव के करीब है, हालाँकि उसे ठीक-ठीक लोक-अनुभव कहा जाएगा। 

यूँ हिंदी कविता में लोक-अनुभव का चित्रण हुआ है लेकिन इधर वर्षों में वह लगभग नदारद है। लोक-कविता की पद्धति और पद्धति को—कम-से-कम दीन कुशवाह की पीढ़ी में भी अष्टभुजा शुक्ल और इक्का-दुक्का अन्य वाद्यों को छोड़ दिया गया है—प्रार्थना की गई है। दिनेश उसकी स्मृति जागते हैं। वह लोक को क्लीशे के साभार गढ़ने और उसके अलंकारिक रूप से उपयोग करने की अवधि में अपने काव्यबोध में बताता है। लोक उनके यहाँ इतना अन्तर्निहित है कि सतह पर दमकता-चमचमाता दिखाई नहीं देता; बल्कि वह अंतर्प्रवाहित होता है। उनकेन्द्र्यानुभूति में वह नमक या शक्र की तरह सौहा होता है। उनकी सौंदर्य-पद्धति-अनुभव-अभिव्यक्ति और उनकी अभिव्यक्ति की पद्धति-भी लोक कविता की संगति में है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह लोक की त्वरित स्मृति को अभिव्यक्त करते हुए शिल्प के भीतर से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी कविताएँ स्मृति पर इस तरह से अत्याधिक हैं कि स्मृति ही उनकी अँदारुनी फर्म को, और शब्द-विन्यास अभिव्यक्ति को, तय करती है। उन्हें याद रह जाने वाली कविताएँ बन जाती हैं। इसलिए इंडोनेशिया लिखित पाठ को हाथ में लिए स्मृति बिनापट पर अंकित अपनी कविता बाँचते हैं। पाठक या श्रोता को भी काव्यार्थ की खोज में उलझाकर नहीं देखा जाता, बल्कि काव्य-मर्म को पकड़ने के लिए उसे पाठ की ओर बार-बार जाने की आदत नहीं होती। वाचन या पाठ के साथ कविता का मर्म धीरे-धीरे, बिना किसी अतिरिक्त रुचि के, सोलो लगता है। किसी भी कविता की यह एक बड़ी कलाकार है। 

दिनेश कुशवाह का काव्य-शब्दकोश विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। उसकी साध्यता और निरलंकार भाषा जो विशेषणों के घटे हुए टॉप से ​​लेकर समय में कविता को विशेषण-मुक्त करती है; यूँ कहा कि वह कविता में विशेष-विरोधी समय रचती है। इसलिए उनकी कविता में वादल शब्द का अलोकेशन है। विषमताओं को लेकर हाहाकार नहीं, एक दुर्लभ प्रशांत मुद्रा है। उनके यहाँ कुछ भी बेथोस, समप्त या वायवीय नहीं है। प्रत्यक्ष, स्पृश्य और ऐन्द्रिक है। इसलिए उनकी काव्यानुभव गढ़े नहीं गए हैं, और न ही शब्दक्रीड़ा या फेब्रिकेशन के परिणाम हैं। वे संश्लिष्ट अनुभव इसी अर्थ में हैं कि महज़ शब्द-संहति के ऊपरी संयोजन से अर्थात् जोड़-तोड़ से नहीं बने हैं, बल्कि अपने मूल स्वभाव में निरयास, सहज और अकृत्रिम हैं। उनकी जड़ें रोज़मर्रा की दुनिया में हैं। यहां कविता आसपास ही बिखरी हुई है, उसे कहीं नहीं जाना है। लोकविद्ता उसकी दृष्टि प्रतिश्रुति है। दिनेश की कविता देखो-भोगे और जाने-सुने का वृत्तांत है। इसलिए काव्यानुभव उनके यहाँ अद्वितीय-अल्कलाकृत और अद्वितीय नहीं, सहज, सुपरिचित और इंटरैक्टिव जन इंटरेक्शन है। 

दिनेश कुशवाह की कविताएँ सुनी गईं दो बातें का ख्याल आया। एक तो यह कि कविता के पाठ की सम्प्रेषणीयता बहुत कुछ काव्य-शब्दावली पर अवलंबित होती है। दूसरा यह है कि हिंदी वेचैटरी ने कविता की भावना और उसके मानवीय अर्थवत्ता की खोज में प्रतिभावान उद्यम में काम किया लेकिन उसके वाचिक मास्टर्स पर कोई समान ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए हिंदी में दार्शनिक की तरह की कविता के एकल सार्वजनिक पाठ यानी 'आवृत्ति' की परंपरा नहीं बन पाई। अस्वीकृत कविता भाषा पर असंतुलित कला है। उनके सम्प्रेषण एवं प्रभाव अर्थात सौन्दर्यानुभव के निर्माण में शब्दों की अवस्थिति या दिग्दर्शन की भूमिका होती है। श्लोक संगति में उनका अर्थ और सन्दर्भ साकार होता है। अर्थात् शब्दों का सह-सम्बन्ध काव्यार्थ को सिद्ध और सुनिश्चित करता है। कविता की लिखित-मुद्रित संरचना और उसके वाचिक पाठ में काव्यार्थ की सिद्धि का स्तर अलग-अलग हो सकता है। उनका वाचिक सम्प्रेषण बहुत-कुछ कवियों के वचन-कौशल पर वर्जित है। संभव है, एक अच्छी कविता वाचन की काली के साथ न पूरी तरह से और प्रभावशाली से संप्रेषित न हो पिए, या कोई साधारण कविता अपने प्रभावशाली पाठ में अर्थ की स्थिरता ताहें साहित्य में अपनी शैली में बेहतर विशिष्ट होने लगे। 

दुर्भाग्य से समकालीन हिंदी कविता के पाठ और वाचिक सम्प्रेषण की कोई प्रभावशाली विधि विकसित नहीं हो पाई है। छंदसंपादित और गाई कविता में स्वयं छंद ही अपनी आंतरिक लय में एक निर्देश निर्मित करता है। मुक्त छंद में भी लय का अपना निर्देश होता है। लेकिन निरे गद्य की लय के साभार वाचिक संप्रेषण का यत्न समकालीन कविता की पाठ-विधि इतनी सहज और सरल नहीं रही है। सहज संप्रेषणीय और संक्षिप्त कविता-पाठ में सिद्धहस्त काव्य के कुछ बिरले कवि उदाहरणों को छोड़ देते हैं तो अक्सर अपनी ही कविता की गद्य-लय को पकड़ नहीं पाते, और कविता को संक्षिप्त पाठ की तरह पढ़ते हैं। छंद और लय के निर्देश में वाचक की अकुशलता छिप जाती है। लेकिन छंदमुक्त कविता का प्रभावशाली पाठ प्रस्तुत करने के लिए वाचन की विशेष दुकान की बिक्री होती है। ऐसी स्थिति में यहां कवि से अलग विशेषज्ञ वाचक की भूमिका सामने आती है जो भावाभिव्यक्ति के लिए स्वर-अभिनय के द्वारा कविता के कथ्य को प्रभावशाली ढंग से संप्रेषित करने में सक्षम होता है। 

समकालीन चित्रकला में कविता पढ़ने का एक कारण यह है कि समकालीन कविता मुख्यतः पाठ्य कविता है, इसलिए पढ़ी-लिखी समाज में मिसाल है। इस रूप में वह वाद्ययंत्र के कौशल पर आधारित कला है। इस तथ्य को रूढ़ी की तरह स्वीकार कर लिया जाए से कवि का ध्यान कविता 'सुनाने' यानी भावपूर्ण सम्प्रेषण की कहानी 'लिखने' पर केंद्रित हो जाती है, क्योंकि यह धारणा स्थापित हो गई है कि लिखित पाठ में ही कविता अपनी काव्यात्मक प्रस्तुति हासिल करती है। कविता-सुनाना अर्थात वाचन मनो एक अतिरिक्त कर्म है। उर्दू में लेखन और वाचन यानी विशाल स्तर पर कविता के सम्प्रेषण की परंपरा कायम रही, इसलिए वहां लिखे और संस्कारित शब्दों के बीच हिंदी की तरह का कोई मतलब नहीं है। इस असंतत की वजह से हिंदी के अधिकांश बच्चों का वचन-कौशल के अंतिम रूप से लाभ और निष्प्रभावी रह जाएं तो क्या आश्चर्य। हिंदी की समसामयिक कविता के लिए उसकी सम्प्रेषणीयता रेखा पाठ शामिल था। दुर्भाग्य से हिंदी में कवि-सम्मेलनों के साथ-साथ लिखित और वाचिक कविता के बीच का दायरा भी बढ़ गया और दोनों की दो समानांतर और स्वरचित दुनिया बन गई। इसके साथ ही जिज्ञासा और प्राथमिकता के बीच एक अलंघ्य पार्थक्य कायम हो गया। अप्रतिम कविता पाठ्य वस्तु बन कर रह गई, जबकि लोकप्रिय कविता अपनी असाध्य अघमभिरता के साथ सामाजिक विस्तार हासिल कर कड़वी संस्कृति में समाहित हो गई। ज्यों-ज्यों समसामयिक कविता अपनी पुरानी पुरानी सांस्कृतिक संस्कृति से दूर और लिखित-मुद्रित माध्यम के कारा में कैद हो गई, उसकी सम्प्रेषणीयता का प्रश्न उसकी धारणा के प्रश्न में बदल गया। दूसरी ओर मंचीय कविता ने जिज्ञासा की कमी को समस्या के रूप में देखा ही नहीं, बल्कि अगिरता, प्रभाव और सतही रंजकता न केवल उसकी जिज्ञासा का गुण, बल्कि उसकी प्राथमिकता का आधार बन गया था।

कविता यदि कला है तो कविता का सुघर पाठ भी कला है। सुघर पाठ का उद्देश्य पाठक को श्रोता बनाकर उसके हृदय में सौंदर्य की मूर्ति स्थापित करना है। सूची है, यह सौन्दर्यानुभूति को प्रगाढ़ करने की युक्ति है। दिनेश कुशवाह की कविताओं की रिकॉर्डिंग से मुझे लगा कि कविता के सम्प्रेषण के मूल सूत्र उनके शब्दकोश में हैं। छोटे-छोटे व्यंग्य वाक्य और काव्यपदों की संगति हो तो सांसों के आरोह-अवरोह के साथ धारकर कविता पढ़ने से उनके अर्थगत सन्दर्भ भली तरह से जुड़े होते हैं। छोटे-छोटे वाक्य गद्यात्मक संरचना में छोटे-छोटे विक्षेप या स्थिरता रचते हैं। इस काव्यभाषा लिखित-मुद्रित भाषा से बाहर देखने में सक्षम हो जाता है। इसमें वाचिक भाषा की लय झलकती है। कवि के अनुभव-विद्या की पद्धति में उसकी अभिव्यक्ति की या शिल्प स्थापित होती है। अभिव्यक्ति में भाषा भी अनुभव के अनुसार ढाल दी जाती है। इसलिए जटिल अनुभव की सरल अभिव्यक्ति को वाचिक पाठ में उतारना कठिन है। 

हिंदी में व्लादिमीर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, भागवत रावत, अशोक चौधरी, राजेश जोशी, अरुण कमल, आदि का काव्यपाठ याद आता है। इन फ्रैंचाइज़ ने अपने घर के सुघर पाठ बनाये हैं। इनके अलावा अनेक श्लोकों की पाठ्य-विधि में वचन-कला की ऊँचाइयों का आकलन किया जा सकता है। रघुवीर सहाय ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कविता-पाठ की पाठशाला की थी। ऐसे की आवश्यकता अब और बढ़ गई है, क्योंकि अपनी ही कविता में बोले गए कई कवि निराश करते हैं। लोककथा सिंह की काव्यपाठ में जंगली-सी नाटकीयता थी जो उनके नायकों की प्रबल और भारी संप्रेषणीय शैली थी। कविता का प्रभावोत्पादक वचन बहुत ही कुछ पौराणिक कथाएँ, विराम, शब्दों के अनुतान, सम्यक बालाघात, आरोह-अवरोह आदि पर स्थापित है। 

कविता रचना स्वयं कवि के लिए एकलक्ष्य नहीं हो सकती। वे स्वयं के लिए कविता पढ़ते हैं, पाठक पाठक, या पाठक के लिए पढ़ते हैं, उनकी कविता-डोइन्स में ठोस नीति एक नहीं होगी। उनका पहला लक्ष्य, सहायक कवि, स्वयं कविता को चित्रित करता है; दूसरे लक्ष्य ऑर्केस्ट्रा को कविता समझाना होता है। पाठक को समझाना या अपनी कविता का वर्णन करना कवि का दायित्व नहीं है, लेकिन पाठक या वाचक के रूप में यह उसका दायित्व भी भिन्न नहीं है; कविता का संक्षिप्त पाठ वह हो सकता है जिसमें वचन की प्रक्रिया में कविता खुल जाए और श्रोता को अपनी संवेदना की तह तक व्यक्ति में सफल हो। संकेत-समझने का यह द्विलक्ष्य प्रयास अपनी कविता को सम्प्रेषित करता है। ये दोनों क्रियाएँ परस्पर सम्बद्ध हैं। कविता का उद्देश्य, संवेदना और निहितार्थ की पूरी समझ के बिना कविता का पाठ प्रभावशाली होगा। कविता कविता समय कवि रचना अपनी-अपनी कविता का पाठ (पाठ) पर एकाग्र करते हैं जो कि चॉकलेट ग्राफिक के रूप में उपलब्ध है। उनके प्रयास प्रशिक्षण पाठ को ही सम्प्रेषित करना होता है, उनकी संवेदना को स्पर्श करना जोर से नहीं होता, या कम होता है।   

कविता अध्ययन में एक तरह का आनंददायक और कौतुक-भरा खेल है जिसमें शब्द, तर्क, उनकी अर्थान्वित्य और विशिष्ट स्वर-भंगिमाओं में निहित संवेदनाएं शामिल हैं जो हमारे अंदर कवि खोलता है। छोटे-छोटे सरल वाक्यों में वैज्ञानिक उच्चारण, बलाघात और मंत्र-से-नाटकीय स्वरभिनय के साथ पाठ किया जाए तो भी उनका शास्त्रीय प्रभाव उत्पन्न होता है। विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी और कुमार अंबुज की मूर्ति इसी तरह के गद्यात्मक सिद्धांत के साथ पढ़ी जा सकती है। यहां सहज प्रशांत लय, स्थिरता और स्वर-गांभीर्य के साथ अभिनेता राजेंद्र गुप्ता और कवि भास्कर चौधरी ने सोशल मीडिया पर कई कविताएं पढ़ी हैं। यूट्यूब का उपयोग समकालीन कविता की वाचिक मास्टर्स मंच की तरह की कहानियाँ, दर्शन की संभावनाएँ अभी-अभी खुली हैं। ये नई घटना है. इस बात का भी यही अर्थ है कि कविता की संचार-विद्या अब तक सीमित नहीं है। आने वाला दौर उसका दृश्य-ध्वन्यात्मक राक्षसों का है।








बुधवार, 15 दिसंबर 2021

छत्तीसगढ़ी खेल गीत

 फुगड़ी


गोबर दे बछरू गोबर दे....चारो खुट ला लीपन दे.. चारो देरानी ला बइठन दे......

अपन खाते गुदा गुदा मोला देथे बीजा बीजा....

ये बीजा ला का करहु रही जाऊ तिजा..

तीजा के बिहान दिन घरी घरी लुड़गा हेर दे भौजी कपाट के खिला....

एक गोड मा लाल भाजी एक गोड मा कपूर कतेक ला मानो में देवर ससुर

फुगड़ी रे फू फू फुगड़ी रे.....


सोमवार, 1 नवंबर 2021

 







एक स्मृति-राग की तरह

रमेश चंद्र शाह की कहानी 'जानकी'




रमेशचंद्र शाह की कहानी 'जानकी' अपनी दुर्लभ सादगी और सहजता में एक अकुंठ-निष्कलुष मन की भीतरी ताहों में संगम संवेगों की मजबूती को भव्यता वाला मार्मिक आख्यान है। यह आख्यान कहानी को यथार्थ की तरह समाजशास्त्रीय समझ के दायरे से मनुष्य के अंतः संसार में खींचा गया है। यहां सामाजिकता की रुढ़ि और आस्थाओं का सुझाव कर कस्बे के रिश्तों की निश्चल इंटरनैशनल और उनके बीच विकसित की गई दोस्ती का वृत्तांत बनाया गया है, उनकी प्रतिभा गहरी अनुराग और मानवीय संस्कृति में है। सामाजिक संबंधों के यांत्रिक घटित होने की प्रक्रिया में आज जब हमारा क़स्बाई और ग्रामीण परिवेश भी व्यक्ति और व्यक्ति के बीच पसरती नमूने और निस्पृहता की चोटी में है, धीरे-धीरे-धीरा लुप्त हो रहा है वह मानवीय राग को यह कहानी विरासत में मिलती है, जो वास्तविक जीवन से अब स्मृतियों की ओर खिसकती जा रही है। बाल्यकाल के तीव्र मनोवेग और कशोर्य की वय-संधि की ओर संक्रमणशील मन के भीतर उठती तरंगों को और उसके बीच धीरे-धीरे पकते भावात्मक संसार को यह यथार्थता के साथ खोलती है।


                                  कहानी की शुरुआत बचपन के दिनों में लड़कियों के प्रतियों के मन में स्वभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले विपरीतलिंगी आकर्षण के साथ होती है। वाचक का संकेत है कि बाल-वय के कथानायक में यह कुछ ऐसी अनोखी बात को आकर्षित करती है कि आखिर क्यों वह लड़कियों के बीच जाने पर खिलखिलाती है और बच्चों के साथ होने लगती है। पिछवाड़े में वह बालकों के साथ अपने बिश्नोई बनाना चाहता था, लेकिन उसके बूटे से बाहर की बात थी। वह अपनी बातों से लड़कियों को प्रभावित करता था, लेकिन लड़के उसके समान गुण के कारण उसे अधिक पसंद नहीं करते थे, हालाँकि उसका किसी से झगड़ा नहीं होता था। स्कूल में सभी उसे पसंद करते थे। वह सबके बीच एक आदर्श लड़का समझा जाता था, लेकिन अपने से छोटी उम्र के लड़के से झगड़ा हुआ और उसके हाथों सरे-बाजार पिट जाने के बाद वह आत्मग्लानि से महीनों तक नहीं मिला। ऐसी ही एक कहानी है एक बच्चे के अंतर्मन की गुत्थियों को पकड़ने की कोशिश शुरू होती है। उसे दुनिया भर में अपनी कमर का पता लगाने के लिए लगता है। ग्लेनी-बोध से प्राप्त करें और अपनी कमतरी को दूर करने के लिए व्यायाम और योग के अभ्यास से शारीरिक बल प्राप्त करने की कोशिश करें और स्थायित्व की तलाश करें, लेकिन इसमें भी असफलता है। सुबह जंगल की सैर में जाना और प्रकृति के सौंदर्य को निहारना शुरू हुआ। इस तरह वह एकांत प्रेमी हो गई। 

                              जंगल और पहाड़ में भटकते हुए उसने सोचा कि पहाड़ की चोटी का नाम बांदी देवी या कसारा देवी आदि क्यों है? उन्हें लगता है कि लड़कियां भी सभी देवियों की तरह हैं -खासकर तब जब वे मुस्कुराती हैं, मोहिनी देवियों की तरह या बगल वाली जानकी की तरह। जानकी उसे बहुत अच्छी लगती है। वह अपने पांचवे साल में बड़ी मोहिनी को तो दे गया लेकिन जानकी को देखने के बाद भी उसे ऐसा नहीं लगा।


                                     फिर एक दिन जानकी से उसकी दोस्ती खत्म हो गई। कहानी में उनकी दोस्ती और गहरे रिश्ते के विविध प्रसंगों का जिक्र किया गया है। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे एक मासूम-सी आस्था में ये कलाकारी हो गई। बन्दीदेवी की सायर पर जंगल में अपने और जानकी के परिवार के जाने और उन दोनों के पीछे जाने पर उन्हें जानकी के साथ बन्दी ने बेतरह अपनी गिरफ़्तार में ले लिया। उसे चारों तरफ जानकी-ही-जानकी दिखाई देती है। उन्हें जानकी साक्षात् बन्दीदेवी जान मन्दिर।

 

                                    जानकी के सान्निध्य के सम्मोहन में डूबे कथानायक के प्रति उनकी छोटी बहन लीला की कहानी का प्रसंग का उल्लेख है। जानकी से कथानायक के बगल में, रोज रात में दुकान बंद करते समय दोनों का खुसुर-पुसुर करना लीला को नहीं सुहाता। जैसे कहीं भी उसके मन में स्वाभाविक स्वभाव पठथ रही हो। यह बालसुलभ चाहत है। लेकिन कथानायक न जुकान दुकान बंद करने में रोज जानकी की मदद करता है और यह सैलून स्टूडियो तक पहुंचता है। फिर जानकी के विवाह की चर्चा हो रही है। मौलवी की सभी लड़कियों की शादी हो रही है। जानकी की शादी तय नहीं हो रही। बात होती है, पर बन नहीं रिज़ॉर्ट की। सहसा एक दिन जानकी के लिए रानीखेत वालों का रिश्ता आने की बात से डर गया न आरोपियों को डेट किया गया और बेहद व्याकुल क्षण में जानकी से कहा गया - 'जानकी, तू चलेगी तो मैं क्या जमा करूंगी? तू मेरे साथ ही ब्याह कर ले, जानकी।' 


                                       कथानायक के भीतर घुमड़ती छोटी-छोटी तरंगों के अनुरूप हो कर उद्दाम लहर में अकस्मात उठा यह क्षण जब प्रकट हुआ तो उसने अपने अस्तित्व को झकझोर दिया। उसका अपना मनो उस मर्म-क्षण में संपूर्णतः एकाग्र हो गया। यह उनकी अंतःस्थल से उठी अकुंठ कॉल थी। जानकी भी इस महासागरीय स्थिति से अचचाचा हो गई। उसकी दृष्टि तेज़ हो गई। लड़के को नहीं पता कि उसके बाद क्या हुआ। 

    वह अपने इनसाइड होमहाउस में शामिल हो गईं। जानकी की 'स्तब्ध-विचित्र छवि' ने उन्हें इस कादर मनोदैहिक रूप से अचदित कर दिया कि उनका गहरा प्रभाव मुक्त न हो सका। उसके मन में ग्लानि थी और उसका देह तप रही थी। यह मनोदैहिक ताप था। अकस्मात् संगत उस क्षण के स्थिर अध्याय को वह ध्यान में नहीं रख सकता। जानकी के प्रति भी अब वह सहज नहीं है।

   

                    

 ना वृद्धाश्रम का प्रत्यक्ष वर्णन करने की साधारण कथाकार ने यहां दुर्लभ या अटकल की कथा युक्ति के रूप में विघ्नधाता का बोध कराया है। इस घटना के बाद क्या हुआ? ऐसा महसूस नहीं हुआ - इसके लिए नाम दिया गया है कि स्टूडियो स्टूडियो जैसा दिखता है, फिर अंत में पूछा गया - 'क्या यह स्टूडियो है।

    इसके बाद कथाकार ने जो विवरण दिया है, उसमें उल्लेख किया गया है कि पूरी कहानी पुरानी यादों में डूबी हुई है। अंत तक की कहानी वर्तमान में प्रचलित है लेकिन अंतिम अध्याय में सहसा पाठकों को पता चलता है कि सभी कुछ कथानायक के स्मृति-संसार में हैं। यह फ़्लैशबैक मॉडल पद्धति का अद्वितीय उपयोग है। आम तौर पर कुछ इस तरह से किया जाता है कि शुरुआत में वर्तमान सर्वोच्च पद के नाम से जाना जाता है, फिर समय की कहानी कही जाती है। लेकिन यहां अंतिम नामकरण के रूप में जाना जाता है। वर्तमान केंचुल का छोड़ कर अतीत में प्रकट होना होता है। कथा-तकनीक की दृष्टि से यह विलक्षण प्रयोग है। फिर आगे भी अतीत के ब्यौरे हैं। न उज़ की मानस स्थिति का और उसके भीतर के ग्लेनी-बोध की प्रत्यक्ष शैली का वर्णन है और यह भी उल्लेख किया गया है कि किस तरह उसकी बाद में बीमार न देखने वाली जानकी आई, उसके मिज़ाजपुर्सी की उसके से दर्शन में फुसुसाकर जिस व्याकुल मनुहार के साथ धीरे से कहा गया था - 'आना हाँ', उसकी किताब में लिखा था कि जानकी दादी ने उसे फिर से माफ कर दिया है। यहां पहली बार न धनु के मन में जानकी के लिए दोस्त शब्द आया।

    क्या ऐसा नहीं लगता कि जानकी के इस 'आना हां' में गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' के 'तेरी कुदामाई हो गई'-जैसी गहरी व्यंजना से एक निश्चित वाक्य की सांकेतिकता भी निहित है? लहनासिंह के चुहल-भरे कथन में एक अमूर्त संबंध का सूक्ष्म बोध और निश्चल प्रेम की कुल कॉल झलक मारती है।

    इस वाक्यांश का अर्थ-संकेत अंततः तब होता है जब चालीस बार बधेड़ न उगे को अचानक जानकी के ब्रह्मलीन रह जाने की जानकारी मिलती है और वह विचार करता है - 'इसमें उसका क्या सुझाव है?' फिर भी वह जाने क्यों उस रात करवटें बदल रही थी और जब जानकी से जिज्ञासा हुई तो जानकी के मुँह से उसे वही कहा गया - "आना, हाँ।" तब चालीस की अंगूठी की अंगूठी को पल-भर में ढहा दिया गया और उसके अतीत को सीधे वर्त्तमान की नोंक में एकाग्र हो उठा लिया गया। एक अजीब-से-अपराध-बोध से उद्घाटित कथानायक के मर्म को भेदता हुआ यह वाक्यांश था - चालीस वृहस्पति की विस्मृति को झकझोरता हुआ, और जानकी के भीतर चालीस वृहस्पति से सिपचती पीड़ा को न निगलता हुआ शामिल हुआ।

                                      इस वाक्यांश की पुस्तक मर्मभेदी चौधरी को महज एक रहस्यमयी अंतरिक्ष रचना के प्रयास के लिए जाना जा सकता है। कथाकार यहां किशोर किशोर बच्चों के अंतर्लोक में समुद्र तट प्रेक्षक की तरह दाख़िल हो कर सम्वेदनशील तारिके से उनका अध्ययन करता है। मानव-व्यवहार की वैश्वीकरण और उसके निहित अनंत रहस्य को समझने के प्रयास से यह कहानी हमारी समझ में बहुत कुछ नया है। यही उसकी सार्थकता है।


                              यह कहानी एक स्मृति-राग की तरह उठती है और पाठक के मन को अद्भुत रूप से प्रभावशाली बनाती है।

रविवार, 31 अक्टूबर 2021






मनुष्य की गति और नियति का रूपक


 रमेश उपाध्याय की कहानी कामधेनु पर एक टिप्पणी



 रमेश उपाध्याय की कहानी ‘कामधेनु’ सत्ता द्वारा पोषित शोषण के दुष्चक्र में उसकी कुटिलता, निर्ममता और उसके विरुद्ध जनता के मूक प्रतिरोध के साथ-साथ मध्यवर्ग के नैतिक स्खलन का आख्यान है। कहानी मध्यवर्गीय कथानायक की आत्मचेतना को उसके परिवेश और जीवन-स्थितियों से मिल रही उन चुनौतियों के प्रत्यक्ष वर्णन के साथ शुरू होती है, जो उसे निरंतर नैतिक असमंजस का शिकार बनाए रखती हैं, फिर अंत में एक मिथकीय-रूपकात्मक आयाम हासिल कर समकालीन वास्तविकता के चरित्र और उसके भीतर सत्ता की निर्मम उपस्थिति को एक फंतासी के माध्यम से विश्लेषित करने लगती हैं। मिथक और वस्तुगत यथार्थ के परस्पर अन्तर्निबद्ध आयामों में समकालीन वास्तविकता को रूपायित करते हुए यह कहानी शिल्प के स्तर पर भी प्रयोग करती है : उसके कथात्मक विन्यास में कल्पना और वास्तविकता के विलक्षण संयोजन को सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है।


                   ज़ाहिर है, यहाँ आख्यान यथार्थ और कल्पना के दो भिन्न स्तरों पर घटित होता है। लेकिन अपनी परिणति में यथार्थ मानो पिघल कर अन्ततः एक कल्पलोक में समा जाता है, जहाँ आख्यान का वास्तविक मर्म उद्घाटित होता है। कहानी के पूर्वार्द्ध में कथानायक का आत्मद्वंद्व उसके यथार्थपरक अनुभव के ब्यौरों में— प्रथम पुरुष  द्वारा कथावाचन के रूप में— प्रस्तुत किया गया है, जबकि परिस्थितियों के दबाव में  आख़िरकार आत्म-समर्पण के लिये विवश होकर और नैतिक रूप से स्खलित हो कर वह उत्तरार्द्ध में जब एक फंतासी में दाख़िल होता है तो जैसे व्यवस्था की चालाकी और क्रूरता के सामने ख़ुद को अपनी आत्मा के अंधकार में, एक भयावह नैतिक शून्य में असहाय पाता है। इस प्रक्रिया में नायक का अंतर्द्वंद्व मनोगत धरातल पर पहुँच कर स्वैरकल्पित वास्तविकता में विसर्जित हो जाता है। यह कहानी उसके प्रत्यक्ष अनुभव-संसार और उसके अन्तर्लोक के दो क्रमिक स्तरों पर घटित होती है।


               कथानायक डॉ. भारद्वाज, जो स्वयं कहानी का वाचक भी है, सामान्य निम्नमध्यवर्गीय परिस्थितियों से घिरा, पेशे से पशुचिकित्सक है। अपने पेशेवर जीवन में वह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ है। उसके भीतर बेहतर जीवन-स्तर हासिल करने की स्वाभाविक आकांक्षा तो है, उसके लिये वह एक योजना भी बनाता है जिसे वह अपने मित्र और सहकर्मी जब्बरसिंह की मदद से साकार करना चाहता है, लेकिन ज़रूरी न्यूनतम संसाधनों के अभाव में, ख़ास तौर पर सीमित आर्थिक स्रोतों के कारण, वह अपने सपने पूरे कर नहीं पाता। दूसरी ओर, अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति के चलते उसके द्वारा सुझाई योजना को उसे भनक लगे बिना जब्बरसिंह मूर्त्त रूप देकर एक पॉश कॉलोनी में अपना निजी क्लीनिक खोल लेता है, पैसे कमाने लगता है और नौकरी छोड़ देता है। फिर धीरे-धीरे तरक़्क़ी और आर्थिक संपन्नता के रास्ते पर सरपट दौड़ते हुए एक ऐसे मुकाम पर पहुँचता है  जहाँ क़ामयाबी मानो उसके क़दम चूमने लगती है, मगर दूसरी ओर उसकी अंतरात्मा मर चुकी है;  फ़रेब और मक्कारी के दुष्चक्र में वह दूसरों को, अपने मित्र यानी कथानायक को भी, घेरने से परहेज नहीं करता। जब्बरसिंह के अनुनय-विनय या मित्रता के दबाव के चलते या थोड़े-से पैसे के लोभ में उसके लिये छोटे-छोटे काम करने को कथानायक हर बार तैयार हो जाता है।  लेकिन अपनी ईमानदारी को बचाए रखने की जद्दोजहद में आख़िरकार कथानायक ने जब्बरसिंह के प्रलोभनों के आगे कब हथियार डाल दिया, उसे पता ही नहीं चलता; वह  उस नैतिक स्खलन की चपेट में आ गया होता है, जिससे बचने की कोशिश में वह लगातार आत्मसंघर्ष से गुज़र रहा था। 


                         अपनी महत्त्वाकांक्षा के रथ पर सवार जब्बरसिंह न केवल उच्चवर्ग के भीतर पैठ बना चुका है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से वह स्वयं उच्चवर्ग में शामिल हो चुका है। जब्बरसिंह का चरित्र मध्यवर्ग में सामान्य रूप से पायी जाने वाली महत्त्वाकांक्षा और उसके चलते उच्चवर्गीय भद्रलोक में दाख़िल होने की लालसा का प्रतिनिधान करता है। वर्गारोहण की यह प्रवृत्ति, कहने की आवश्यकता नहीं कि आज मध्यवर्ग में अत्यंत संक्रामक रूप ले चुकी है।  उसका बैंडवैगन प्रभाव समाज मे स्पष्ट दिखाई देता है। कथानायक भी अपनी समूची नैतिक सम्वेदनशीलता और मध्यवर्गीय आत्मसंकोच के बावजूद इससे अछूता नहीं है; उसके भीतर एक दबी-कुचली आकांक्षा के रूप में वह कहीं-न-कहीं मौजूद है, जो मौक़े पर, संयमित रूप में ही सही, प्रकट भी होती है। पर अंततः वह भी उसका शिकार होने से बच नहीं पाता। यही उसकी त्रासदी है। यह कहना अनावश्यक है कि यह त्रासदी ही इस कहानी का कथ्य है। मध्यवर्ग के ऊहापोह और उसकी जीवन-विडम्बना को उद्घाटित करना दरअसल कहानी का लक्ष्य भी है। इसलिये शुरूआत में कथानायक और जब्बरसिंह के बीच जो वर्गीय दूरी दिखाई दे रही थी, वह बाद में मिट जाती है। इस दूरी को कथानायक परिस्थितियों के दबाव में स्वयं पाट देता है और मुख्य पशु-चिकित्सक बनने के महारानी राज्यलक्ष्मी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है, जबकि जब्बरसिंह ने स्वयं यह पद हासिल करने के लिए ही योजना बना कर उसे महारानी से मिलवाया था। जब स्थितियाँ बदल जाती हैं तो कथानायक उससे फ़ायदा उठाने में आगे-पीछे नहीं सोचता। यहीं से उसका वर्गान्तरण शुरू होता है जो दरअसल उसकी मध्यवर्गीय जीवन की स्वाभाविक चारित्रिक दिशा हैै। अब वह जब्बरसिंह की इच्छा और अनुरोध से नियंत्रित, उसकी स्वार्थपूर्ति का निरीह साधन नहीं, उसका प्रतिस्पर्द्धी है, उसे धकिया कर आगे बढ़ जाता है।


                          मगर मध्यवर्गीय जीवन की इस  विडम्बनापूर्ण परिणति को उद्घाटित करने के बाद कहानी पूरी नहीं हो जाती। वह एक वृहत्तर लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है और सामाजिक तंत्र में शोषण की प्रक्रिया की पड़ताल पर एकाग्र हो उठती है। कथाकार ने कामधेनु के मिथक का इस्तेमाल इसी उद्देश्य से किया है। फिर अंत में उसने मध्यवर्गीय व्यक्ति की ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना’ (मुक्तिबोध के शब्द) की तरफ़ संकेत करने के लिए कथानायक के आत्मद्वंद्व को महारानी राज्यलक्ष्मी के पूर्ववर्त्ती मुख्य चिकित्सक के जीवन की  परिणति में निहित सांकेतिकता और उसकी ही तरह कथानायक के भी आख़िरकार पागल हो जाने की नियति को फेंटेसी के माध्यम से रचा है। ज़ाहिर है, यह कहानी दमनकारी सामाजिक व्यवस्था में मध्यवर्ग के सम्वेदनशील नागरिक की त्रासद विडम्बना की ओर गहराई से इशारा करती है। 


                         निस्संदेह यह नया विषय नहीं है। मुक्तिबोध का समूचा लेखन प्रायः इसी विषय पर एकाग्र है। डॉ.  भारद्वाज दरअसल मुक्तिबोध की कहानी ‘पक्षी और दीमक’ के कथानायक का ही चारित्रिक प्रतिरूप है, जो भगवा खद्दरधारी शख़्स के सामने बौना पड़ जाता है और उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ अपनी राय तक व्यक्त नहीं कर पाता। वह उस पक्षी की तरह है जो अपने पंखों से, अपनी विवेक-चेतना से क्रमशः वंचित होता चला जाता है। वह दरअसल ‘सतह से उठता आदमी’ है। मुक्तिबोध  के काव्य-संसार में तो मध्यवर्ग की विवेक-चेतना के झकझोर देने के अनेक प्रसंग हैं। उनका चरितनायक कहीं एक अजाने अपराध-बोध से ग्रस्त हो कर मनोविक्षेप का शिकार हो उठने की हद तक अपने मनोलोक का असहाय बन्दी है। आत्मसंशय और गहरे नैतिक ऊहापोह के भँवर से निकलने  के तनाव में  पागलपन के प्रतीक या ब्रह्मराक्षस-सरीखे मिथक के भीतर वह अपने आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति पाता है। मगर  मनोलोक की प्राचीरों को तोड़ कर सजग-सतर्क अवस्था में वह जनक्रांति की सम्भावना और उसमें मुक्ति का स्वप्न देखता है। ‘कामधेनु’ कहानी भी कमोबेश मुक्तिबोधीय उपकरणों से रची गयी जान पड़ती है।


                            रमेश उपाध्याय ने कथात्मक वास्तविकता को पुरअसर तरीक़े से रचने के लिये मिथक और उसकी प्रतीकात्मकता का उपयोग किया है। कामधेनु की उत्पत्ति और राजा विश्वामित्र द्वारा महर्षि वशिष्ठ से उसका बलात अपहरण किये जाने पर अपनी मुक्ति के लिए अपनी हुंकार से पह्लव,यवन, शक, काम्बोज म्लेच्छ, हारीत और किरात जातियों के सहस्रों वीर योद्धा उत्पन्न कर विश्वामित्र की समूची सेना का संहार कर डालने के पौराणिक प्रसंग के निहितार्थ पर ग़ौर किया जाना चाहिए। पौराणिक कामधेनु की प्रतिरोध-वृत्ति के समानांतर इस कहानी के आख्यान में महारानी राज्यलक्ष्मी की कामधेनु भी पूजा के नाम पर अपना अबाध दोहन किये जाने से और बुरी तरह सताए जाने के बावजूद महारानी की मनोकामना पूर्ण करने से इनकार करती है। यह उसका मूक विद्रोह है। कहानी में इसे मौजूदा समय में पूंजीवादी जनतंत्र के भीतर जनता के शोषण और उसके प्रतिरोध के रूप में अर्थान्तर कर पढ़ा जा सकता है। इसकी पुष्टि अख़बार में छपी कामधेनु स्टेट की उस ख़बर से भी होती है, जिसके मुताबिक स्टेट के एक भाग में पकड़े गए क्रांतिकारियों में वही यवन, शक, काम्बोज, म्लेच्छ, हारीत और किरात शामिल थे। जन-प्रतिवाद का यह प्रसंग कुशलता के साथ और सांकेतिक ढंग से कहानी में विन्यस्त किया गया है। 

     

                      कथानायक की त्रासदी यह है कि दमन-शोषण के इस समूचे दुष्चक्र में भागीदार होने की नियति उसे भीतर तक कचोटती है और गहरा अपराध-बोध पैदा करती है। हालात से समझौता करने और प्रतिरोध की हूक उठने के बीच तनाव के प्रबल आघात से क्षत-विक्षत उसकी अंतश्चेतना अंततः एक तरह के मनोविक्षेप में, हैल्युुसिनेशन-जैसी स्थितियों में शरण लेती है। कामधेनु के सामने नायक का असम्बद्ध, अतार्किक और असंगत आत्मालाप मौजूदा सामाजिक तंत्र के भीतर व्यक्ति की विफलता और व्यर्थता की तीव्र अभिव्यक्ति है। इस कहानी को समकालीन व्यवस्था तथा उसमें मनुष्य की गति और नियति के रूपक के तौर पर भी पढ़ा जा सकता है।