छोटे-से सभागृह में बैठे श्रोता सौंदर्य के अद्भुत लोक में तन्मय थे। वे कुछ शिक्षक थे, कुछ कविता-पारखी; इलाही गण थे जो कविता से लोहवा अनाभ्यस्त थे। बहुतों ने ऐसी कविता पढ़ी थी, जो चांदों और तुकों का प्रयोग न हो, इसके बाद अपनी अनपहचानी-सी लय हो, और जो एकबारगी कविता ही न जान खराब हो, फिर भी मुग्ध भाव से उनके जादू की गिरफ़्त में हो। दिनेश कुशवाह अपनी कविताएँ सुन रहे थे। श्रोता विस्मय से अंतिम सुन रहे थे। पंक्तिबद्ध मॉडल के मुख से नि:सृत हो रही थी। पढ़ो वह नहीं रहे थे, सुना रहे थे। उन्होंने लिखी हुई कविताएँ थीं, लेकिन पढ़ी नहीं जा रही थीं। कवि के हाथ में लिखित पाठ नहीं था। अंदर से जैसे रस रस अपने-अपने कंठ से झर रहा था। वाचिक का वैभव उत्कर्ष पर था। यह धारणा देखते-देखते टूटती रही थी कि आधुनिक कविता मूलत: पाठ्य कविता है, वह सुगठित-लिखित पाठ में बंधी है। कविताएँ सीधे स्मृति-कोश से बाहर आ रही हैं। पढ़ने वाली कविता अब पढ़ने वाली कविता बन गई थी।
पाठ को लिखित-मुद्रित की लिपिबद्ध बंदियों से, मुक्त कर देना हंसी-ना में था। अनादि श्रोता भी उसे लेकर मर्म तक पहुंच पा रहे थे। उनका आनंद उनकी मुखाकृति से झलक रहा था।
तीसरी कविता ने एक और कविता लिखी—'डॉ. 'विश्वरात्रि का खाना'। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे-धीरे में नष्ट होने लगी। पाठ्य भी अनोखा। कविता में कहा गया है कि भोजन करना आत्ममग्न होकर आनंद-प्राप्ति की क्रिया है। इसमें रस का स्रोत सामने आया था। उनके पेज में सौन्दर्य-ग्रन्थ की सलिका भी थी। प्रशंसा के बिना स्वाद कैसा! गुण हैं तो गुणग्राहक भी हैं—रस है तो रसग्राही भी। रसमुग्धनाथनाथजी की कल्पना करें रसमग्न स्त्रोत। कविता में रस की कहानियाँ काव्यवाद के समतुल्य बता रही हैं। रसास्वाद और काव्यवाद की समतुल्यता में भरतमुनि की याद और सहजता है जो उन्हें ब्रह्मानंद-सहोदर शिष्य कहते हैं। कविता उन्हें भी याद कर रही थी। कवि की विदग्धता चरम पर थी- अनादि पिशाचिनी में भी विद्या ही विदग्धता संचरित होती है। फिर गयी अंतिम पंक्तियाँ तो जैसे बेहद ताक़तवर पंचलाइन बन गयीं—रसोड्रेक को पूरी तरह से अंतिम पंक्ति तक ले गयीं :
'बाबा किसी गरीब बाभन के बेटे बचे/अन्यथा अमीरों में पले हुए/किसी भी आदमी की जीभ पर/नहीं चढ़े अन्नमातृ का ऐसा स्वाद/उनके खाने की तुलना गरीब मजदूर या/हलवे की, खेत पर पैसे वाली/भूख से ही जा सकते हैं/अन्यथा पास के विकल्प हैं स्वाद के/वे नहीं जानते भूख का स्वाद।'
यह अद्भुत कविता थी। अनोखा पाठ और उसका प्रभाव। यह देखना सुखद था कि कविता का पाठ भी नाटकीय कला की तरह मनोहारी हो सकता है।
दिनेश कुशवाह ने लिखित-मुद्रित कविता और वाचिक खण्ड का भेद लगभग निरर्थक बनाया था। कविता का ऐसा असवाद शांत था। विश्वनाथजी भोजन-रस का जो असवाद जिह्वा से ले रहे थे चित्रित, कविता में उसे श्रोता ग्रहण से ग्रहण कर रहे थे। उसका प्रवाह युक्त तरल भाषा अंदर मोटी जा रही थी, बल्कि भाषा ही तरल पदार्थ प्रवाहित थी। शोध के अंत में यह नहीं कहा गया कि यह वाचिक मास्टर्स का तरलता था जबकि दिनेश कुशवाह की कविता तो प्रारूप में लिखी गई थी। वह सहज है, वह सहज में ही वाचिक में रूपान्तरित को पर्युत्सुक भाषा थी। यह दिनेश कुशवाह की नाव का नैसर्गिक गुण है।
दिनेश कुशवाह की काव्यभाषा क्रिस्टलीय भाषा नहीं है, जिसमें कहीं की काव्यात्मक कविताएँ लिखी हुई हैं। वह लिखित-मुद्रित भाषा की होल्डिंग कंपनी में जमा नहीं हुई है। लेकिन वह लोक-कविता की तरह अपरिष्कृत और अनायास स्फूर्ति भी नहीं है। लोकभाषा की लय शामिल हो गई है। उसकी दो किताबों की ओर एक दृष्टि में ही ध्यान दिया जाता है—एक सांस में पढ़ने जा सकने वाले सरल वाक्य और लड़की विशेषण विकसन भिक्षु। इन लोकभाषाओं के गुण लिखित भाषा में शामिल हैं, जिनमें से एक का जतन उन्होंने किया है। लोकभाषा के काव्य में कवि के अनुभव-ज्ञान की पद्धति और उसके नैसर्गिक गीत स्वयमेव का अवलोकन शामिल है। साधुभाषा का कड़वी कोयला भंडार उसकी भव्यता सेंध लगाता है और धीरे-धीरे-से स्वयं को जोड़ता है। स्पष्ट है कि दिनेश कुशवाह जिस काव्यानुभव को रचते हैं, गुणात्मक रूप से वह लोक-अनुभव के करीब है, हालाँकि उसे ठीक-ठीक लोक-अनुभव कहा जाएगा।
यूँ हिंदी कविता में लोक-अनुभव का चित्रण हुआ है लेकिन इधर वर्षों में वह लगभग नदारद है। लोक-कविता की पद्धति और पद्धति को—कम-से-कम दीन कुशवाह की पीढ़ी में भी अष्टभुजा शुक्ल और इक्का-दुक्का अन्य वाद्यों को छोड़ दिया गया है—प्रार्थना की गई है। दिनेश उसकी स्मृति जागते हैं। वह लोक को क्लीशे के साभार गढ़ने और उसके अलंकारिक रूप से उपयोग करने की अवधि में अपने काव्यबोध में बताता है। लोक उनके यहाँ इतना अन्तर्निहित है कि सतह पर दमकता-चमचमाता दिखाई नहीं देता; बल्कि वह अंतर्प्रवाहित होता है। उनकेन्द्र्यानुभूति में वह नमक या शक्र की तरह सौहा होता है। उनकी सौंदर्य-पद्धति-अनुभव-अभिव्यक्ति और उनकी अभिव्यक्ति की पद्धति-भी लोक कविता की संगति में है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह लोक की त्वरित स्मृति को अभिव्यक्त करते हुए शिल्प के भीतर से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी कविताएँ स्मृति पर इस तरह से अत्याधिक हैं कि स्मृति ही उनकी अँदारुनी फर्म को, और शब्द-विन्यास अभिव्यक्ति को, तय करती है। उन्हें याद रह जाने वाली कविताएँ बन जाती हैं। इसलिए इंडोनेशिया लिखित पाठ को हाथ में लिए स्मृति बिनापट पर अंकित अपनी कविता बाँचते हैं। पाठक या श्रोता को भी काव्यार्थ की खोज में उलझाकर नहीं देखा जाता, बल्कि काव्य-मर्म को पकड़ने के लिए उसे पाठ की ओर बार-बार जाने की आदत नहीं होती। वाचन या पाठ के साथ कविता का मर्म धीरे-धीरे, बिना किसी अतिरिक्त रुचि के, सोलो लगता है। किसी भी कविता की यह एक बड़ी कलाकार है।
दिनेश कुशवाह का काव्य-शब्दकोश विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करता है। उसकी साध्यता और निरलंकार भाषा जो विशेषणों के घटे हुए टॉप से लेकर समय में कविता को विशेषण-मुक्त करती है; यूँ कहा कि वह कविता में विशेष-विरोधी समय रचती है। इसलिए उनकी कविता में वादल शब्द का अलोकेशन है। विषमताओं को लेकर हाहाकार नहीं, एक दुर्लभ प्रशांत मुद्रा है। उनके यहाँ कुछ भी बेथोस, समप्त या वायवीय नहीं है। प्रत्यक्ष, स्पृश्य और ऐन्द्रिक है। इसलिए उनकी काव्यानुभव गढ़े नहीं गए हैं, और न ही शब्दक्रीड़ा या फेब्रिकेशन के परिणाम हैं। वे संश्लिष्ट अनुभव इसी अर्थ में हैं कि महज़ शब्द-संहति के ऊपरी संयोजन से अर्थात् जोड़-तोड़ से नहीं बने हैं, बल्कि अपने मूल स्वभाव में निरयास, सहज और अकृत्रिम हैं। उनकी जड़ें रोज़मर्रा की दुनिया में हैं। यहां कविता आसपास ही बिखरी हुई है, उसे कहीं नहीं जाना है। लोकविद्ता उसकी दृष्टि प्रतिश्रुति है। दिनेश की कविता देखो-भोगे और जाने-सुने का वृत्तांत है। इसलिए काव्यानुभव उनके यहाँ अद्वितीय-अल्कलाकृत और अद्वितीय नहीं, सहज, सुपरिचित और इंटरैक्टिव जन इंटरेक्शन है।
दिनेश कुशवाह की कविताएँ सुनी गईं दो बातें का ख्याल आया। एक तो यह कि कविता के पाठ की सम्प्रेषणीयता बहुत कुछ काव्य-शब्दावली पर अवलंबित होती है। दूसरा यह है कि हिंदी वेचैटरी ने कविता की भावना और उसके मानवीय अर्थवत्ता की खोज में प्रतिभावान उद्यम में काम किया लेकिन उसके वाचिक मास्टर्स पर कोई समान ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए हिंदी में दार्शनिक की तरह की कविता के एकल सार्वजनिक पाठ यानी 'आवृत्ति' की परंपरा नहीं बन पाई। अस्वीकृत कविता भाषा पर असंतुलित कला है। उनके सम्प्रेषण एवं प्रभाव अर्थात सौन्दर्यानुभव के निर्माण में शब्दों की अवस्थिति या दिग्दर्शन की भूमिका होती है। श्लोक संगति में उनका अर्थ और सन्दर्भ साकार होता है। अर्थात् शब्दों का सह-सम्बन्ध काव्यार्थ को सिद्ध और सुनिश्चित करता है। कविता की लिखित-मुद्रित संरचना और उसके वाचिक पाठ में काव्यार्थ की सिद्धि का स्तर अलग-अलग हो सकता है। उनका वाचिक सम्प्रेषण बहुत-कुछ कवियों के वचन-कौशल पर वर्जित है। संभव है, एक अच्छी कविता वाचन की काली के साथ न पूरी तरह से और प्रभावशाली से संप्रेषित न हो पिए, या कोई साधारण कविता अपने प्रभावशाली पाठ में अर्थ की स्थिरता ताहें साहित्य में अपनी शैली में बेहतर विशिष्ट होने लगे।
दुर्भाग्य से समकालीन हिंदी कविता के पाठ और वाचिक सम्प्रेषण की कोई प्रभावशाली विधि विकसित नहीं हो पाई है। छंदसंपादित और गाई कविता में स्वयं छंद ही अपनी आंतरिक लय में एक निर्देश निर्मित करता है। मुक्त छंद में भी लय का अपना निर्देश होता है। लेकिन निरे गद्य की लय के साभार वाचिक संप्रेषण का यत्न समकालीन कविता की पाठ-विधि इतनी सहज और सरल नहीं रही है। सहज संप्रेषणीय और संक्षिप्त कविता-पाठ में सिद्धहस्त काव्य के कुछ बिरले कवि उदाहरणों को छोड़ देते हैं तो अक्सर अपनी ही कविता की गद्य-लय को पकड़ नहीं पाते, और कविता को संक्षिप्त पाठ की तरह पढ़ते हैं। छंद और लय के निर्देश में वाचक की अकुशलता छिप जाती है। लेकिन छंदमुक्त कविता का प्रभावशाली पाठ प्रस्तुत करने के लिए वाचन की विशेष दुकान की बिक्री होती है। ऐसी स्थिति में यहां कवि से अलग विशेषज्ञ वाचक की भूमिका सामने आती है जो भावाभिव्यक्ति के लिए स्वर-अभिनय के द्वारा कविता के कथ्य को प्रभावशाली ढंग से संप्रेषित करने में सक्षम होता है।
समकालीन चित्रकला में कविता पढ़ने का एक कारण यह है कि समकालीन कविता मुख्यतः पाठ्य कविता है, इसलिए पढ़ी-लिखी समाज में मिसाल है। इस रूप में वह वाद्ययंत्र के कौशल पर आधारित कला है। इस तथ्य को रूढ़ी की तरह स्वीकार कर लिया जाए से कवि का ध्यान कविता 'सुनाने' यानी भावपूर्ण सम्प्रेषण की कहानी 'लिखने' पर केंद्रित हो जाती है, क्योंकि यह धारणा स्थापित हो गई है कि लिखित पाठ में ही कविता अपनी काव्यात्मक प्रस्तुति हासिल करती है। कविता-सुनाना अर्थात वाचन मनो एक अतिरिक्त कर्म है। उर्दू में लेखन और वाचन यानी विशाल स्तर पर कविता के सम्प्रेषण की परंपरा कायम रही, इसलिए वहां लिखे और संस्कारित शब्दों के बीच हिंदी की तरह का कोई मतलब नहीं है। इस असंतत की वजह से हिंदी के अधिकांश बच्चों का वचन-कौशल के अंतिम रूप से लाभ और निष्प्रभावी रह जाएं तो क्या आश्चर्य। हिंदी की समसामयिक कविता के लिए उसकी सम्प्रेषणीयता रेखा पाठ शामिल था। दुर्भाग्य से हिंदी में कवि-सम्मेलनों के साथ-साथ लिखित और वाचिक कविता के बीच का दायरा भी बढ़ गया और दोनों की दो समानांतर और स्वरचित दुनिया बन गई। इसके साथ ही जिज्ञासा और प्राथमिकता के बीच एक अलंघ्य पार्थक्य कायम हो गया। अप्रतिम कविता पाठ्य वस्तु बन कर रह गई, जबकि लोकप्रिय कविता अपनी असाध्य अघमभिरता के साथ सामाजिक विस्तार हासिल कर कड़वी संस्कृति में समाहित हो गई। ज्यों-ज्यों समसामयिक कविता अपनी पुरानी पुरानी सांस्कृतिक संस्कृति से दूर और लिखित-मुद्रित माध्यम के कारा में कैद हो गई, उसकी सम्प्रेषणीयता का प्रश्न उसकी धारणा के प्रश्न में बदल गया। दूसरी ओर मंचीय कविता ने जिज्ञासा की कमी को समस्या के रूप में देखा ही नहीं, बल्कि अगिरता, प्रभाव और सतही रंजकता न केवल उसकी जिज्ञासा का गुण, बल्कि उसकी प्राथमिकता का आधार बन गया था।
कविता यदि कला है तो कविता का सुघर पाठ भी कला है। सुघर पाठ का उद्देश्य पाठक को श्रोता बनाकर उसके हृदय में सौंदर्य की मूर्ति स्थापित करना है। सूची है, यह सौन्दर्यानुभूति को प्रगाढ़ करने की युक्ति है। दिनेश कुशवाह की कविताओं की रिकॉर्डिंग से मुझे लगा कि कविता के सम्प्रेषण के मूल सूत्र उनके शब्दकोश में हैं। छोटे-छोटे व्यंग्य वाक्य और काव्यपदों की संगति हो तो सांसों के आरोह-अवरोह के साथ धारकर कविता पढ़ने से उनके अर्थगत सन्दर्भ भली तरह से जुड़े होते हैं। छोटे-छोटे वाक्य गद्यात्मक संरचना में छोटे-छोटे विक्षेप या स्थिरता रचते हैं। इस काव्यभाषा लिखित-मुद्रित भाषा से बाहर देखने में सक्षम हो जाता है। इसमें वाचिक भाषा की लय झलकती है। कवि के अनुभव-विद्या की पद्धति में उसकी अभिव्यक्ति की या शिल्प स्थापित होती है। अभिव्यक्ति में भाषा भी अनुभव के अनुसार ढाल दी जाती है। इसलिए जटिल अनुभव की सरल अभिव्यक्ति को वाचिक पाठ में उतारना कठिन है।
हिंदी में व्लादिमीर सिंह, विनोद कुमार शुक्ल, भागवत रावत, अशोक चौधरी, राजेश जोशी, अरुण कमल, आदि का काव्यपाठ याद आता है। इन फ्रैंचाइज़ ने अपने घर के सुघर पाठ बनाये हैं। इनके अलावा अनेक श्लोकों की पाठ्य-विधि में वचन-कला की ऊँचाइयों का आकलन किया जा सकता है। रघुवीर सहाय ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में कविता-पाठ की पाठशाला की थी। ऐसे की आवश्यकता अब और बढ़ गई है, क्योंकि अपनी ही कविता में बोले गए कई कवि निराश करते हैं। लोककथा सिंह की काव्यपाठ में जंगली-सी नाटकीयता थी जो उनके नायकों की प्रबल और भारी संप्रेषणीय शैली थी। कविता का प्रभावोत्पादक वचन बहुत ही कुछ पौराणिक कथाएँ, विराम, शब्दों के अनुतान, सम्यक बालाघात, आरोह-अवरोह आदि पर स्थापित है।
कविता रचना स्वयं कवि के लिए एकलक्ष्य नहीं हो सकती। वे स्वयं के लिए कविता पढ़ते हैं, पाठक पाठक, या पाठक के लिए पढ़ते हैं, उनकी कविता-डोइन्स में ठोस नीति एक नहीं होगी। उनका पहला लक्ष्य, सहायक कवि, स्वयं कविता को चित्रित करता है; दूसरे लक्ष्य ऑर्केस्ट्रा को कविता समझाना होता है। पाठक को समझाना या अपनी कविता का वर्णन करना कवि का दायित्व नहीं है, लेकिन पाठक या वाचक के रूप में यह उसका दायित्व भी भिन्न नहीं है; कविता का संक्षिप्त पाठ वह हो सकता है जिसमें वचन की प्रक्रिया में कविता खुल जाए और श्रोता को अपनी संवेदना की तह तक व्यक्ति में सफल हो। संकेत-समझने का यह द्विलक्ष्य प्रयास अपनी कविता को सम्प्रेषित करता है। ये दोनों क्रियाएँ परस्पर सम्बद्ध हैं। कविता का उद्देश्य, संवेदना और निहितार्थ की पूरी समझ के बिना कविता का पाठ प्रभावशाली होगा। कविता कविता समय कवि रचना अपनी-अपनी कविता का पाठ (पाठ) पर एकाग्र करते हैं जो कि चॉकलेट ग्राफिक के रूप में उपलब्ध है। उनके प्रयास प्रशिक्षण पाठ को ही सम्प्रेषित करना होता है, उनकी संवेदना को स्पर्श करना जोर से नहीं होता, या कम होता है।
कविता अध्ययन में एक तरह का आनंददायक और कौतुक-भरा खेल है जिसमें शब्द, तर्क, उनकी अर्थान्वित्य और विशिष्ट स्वर-भंगिमाओं में निहित संवेदनाएं शामिल हैं जो हमारे अंदर कवि खोलता है। छोटे-छोटे सरल वाक्यों में वैज्ञानिक उच्चारण, बलाघात और मंत्र-से-नाटकीय स्वरभिनय के साथ पाठ किया जाए तो भी उनका शास्त्रीय प्रभाव उत्पन्न होता है। विष्णु खरे, मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी और कुमार अंबुज की मूर्ति इसी तरह के गद्यात्मक सिद्धांत के साथ पढ़ी जा सकती है। यहां सहज प्रशांत लय, स्थिरता और स्वर-गांभीर्य के साथ अभिनेता राजेंद्र गुप्ता और कवि भास्कर चौधरी ने सोशल मीडिया पर कई कविताएं पढ़ी हैं। यूट्यूब का उपयोग समकालीन कविता की वाचिक मास्टर्स मंच की तरह की कहानियाँ, दर्शन की संभावनाएँ अभी-अभी खुली हैं। ये नई घटना है. इस बात का भी यही अर्थ है कि कविता की संचार-विद्या अब तक सीमित नहीं है। आने वाला दौर उसका दृश्य-ध्वन्यात्मक राक्षसों का है।
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