रविवार, 31 अक्टूबर 2021






मनुष्य की गति और नियति का रूपक


 रमेश उपाध्याय की कहानी कामधेनु पर एक टिप्पणी



 रमेश उपाध्याय की कहानी ‘कामधेनु’ सत्ता द्वारा पोषित शोषण के दुष्चक्र में उसकी कुटिलता, निर्ममता और उसके विरुद्ध जनता के मूक प्रतिरोध के साथ-साथ मध्यवर्ग के नैतिक स्खलन का आख्यान है। कहानी मध्यवर्गीय कथानायक की आत्मचेतना को उसके परिवेश और जीवन-स्थितियों से मिल रही उन चुनौतियों के प्रत्यक्ष वर्णन के साथ शुरू होती है, जो उसे निरंतर नैतिक असमंजस का शिकार बनाए रखती हैं, फिर अंत में एक मिथकीय-रूपकात्मक आयाम हासिल कर समकालीन वास्तविकता के चरित्र और उसके भीतर सत्ता की निर्मम उपस्थिति को एक फंतासी के माध्यम से विश्लेषित करने लगती हैं। मिथक और वस्तुगत यथार्थ के परस्पर अन्तर्निबद्ध आयामों में समकालीन वास्तविकता को रूपायित करते हुए यह कहानी शिल्प के स्तर पर भी प्रयोग करती है : उसके कथात्मक विन्यास में कल्पना और वास्तविकता के विलक्षण संयोजन को सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है।


                   ज़ाहिर है, यहाँ आख्यान यथार्थ और कल्पना के दो भिन्न स्तरों पर घटित होता है। लेकिन अपनी परिणति में यथार्थ मानो पिघल कर अन्ततः एक कल्पलोक में समा जाता है, जहाँ आख्यान का वास्तविक मर्म उद्घाटित होता है। कहानी के पूर्वार्द्ध में कथानायक का आत्मद्वंद्व उसके यथार्थपरक अनुभव के ब्यौरों में— प्रथम पुरुष  द्वारा कथावाचन के रूप में— प्रस्तुत किया गया है, जबकि परिस्थितियों के दबाव में  आख़िरकार आत्म-समर्पण के लिये विवश होकर और नैतिक रूप से स्खलित हो कर वह उत्तरार्द्ध में जब एक फंतासी में दाख़िल होता है तो जैसे व्यवस्था की चालाकी और क्रूरता के सामने ख़ुद को अपनी आत्मा के अंधकार में, एक भयावह नैतिक शून्य में असहाय पाता है। इस प्रक्रिया में नायक का अंतर्द्वंद्व मनोगत धरातल पर पहुँच कर स्वैरकल्पित वास्तविकता में विसर्जित हो जाता है। यह कहानी उसके प्रत्यक्ष अनुभव-संसार और उसके अन्तर्लोक के दो क्रमिक स्तरों पर घटित होती है।


               कथानायक डॉ. भारद्वाज, जो स्वयं कहानी का वाचक भी है, सामान्य निम्नमध्यवर्गीय परिस्थितियों से घिरा, पेशे से पशुचिकित्सक है। अपने पेशेवर जीवन में वह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ है। उसके भीतर बेहतर जीवन-स्तर हासिल करने की स्वाभाविक आकांक्षा तो है, उसके लिये वह एक योजना भी बनाता है जिसे वह अपने मित्र और सहकर्मी जब्बरसिंह की मदद से साकार करना चाहता है, लेकिन ज़रूरी न्यूनतम संसाधनों के अभाव में, ख़ास तौर पर सीमित आर्थिक स्रोतों के कारण, वह अपने सपने पूरे कर नहीं पाता। दूसरी ओर, अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति के चलते उसके द्वारा सुझाई योजना को उसे भनक लगे बिना जब्बरसिंह मूर्त्त रूप देकर एक पॉश कॉलोनी में अपना निजी क्लीनिक खोल लेता है, पैसे कमाने लगता है और नौकरी छोड़ देता है। फिर धीरे-धीरे तरक़्क़ी और आर्थिक संपन्नता के रास्ते पर सरपट दौड़ते हुए एक ऐसे मुकाम पर पहुँचता है  जहाँ क़ामयाबी मानो उसके क़दम चूमने लगती है, मगर दूसरी ओर उसकी अंतरात्मा मर चुकी है;  फ़रेब और मक्कारी के दुष्चक्र में वह दूसरों को, अपने मित्र यानी कथानायक को भी, घेरने से परहेज नहीं करता। जब्बरसिंह के अनुनय-विनय या मित्रता के दबाव के चलते या थोड़े-से पैसे के लोभ में उसके लिये छोटे-छोटे काम करने को कथानायक हर बार तैयार हो जाता है।  लेकिन अपनी ईमानदारी को बचाए रखने की जद्दोजहद में आख़िरकार कथानायक ने जब्बरसिंह के प्रलोभनों के आगे कब हथियार डाल दिया, उसे पता ही नहीं चलता; वह  उस नैतिक स्खलन की चपेट में आ गया होता है, जिससे बचने की कोशिश में वह लगातार आत्मसंघर्ष से गुज़र रहा था। 


                         अपनी महत्त्वाकांक्षा के रथ पर सवार जब्बरसिंह न केवल उच्चवर्ग के भीतर पैठ बना चुका है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से वह स्वयं उच्चवर्ग में शामिल हो चुका है। जब्बरसिंह का चरित्र मध्यवर्ग में सामान्य रूप से पायी जाने वाली महत्त्वाकांक्षा और उसके चलते उच्चवर्गीय भद्रलोक में दाख़िल होने की लालसा का प्रतिनिधान करता है। वर्गारोहण की यह प्रवृत्ति, कहने की आवश्यकता नहीं कि आज मध्यवर्ग में अत्यंत संक्रामक रूप ले चुकी है।  उसका बैंडवैगन प्रभाव समाज मे स्पष्ट दिखाई देता है। कथानायक भी अपनी समूची नैतिक सम्वेदनशीलता और मध्यवर्गीय आत्मसंकोच के बावजूद इससे अछूता नहीं है; उसके भीतर एक दबी-कुचली आकांक्षा के रूप में वह कहीं-न-कहीं मौजूद है, जो मौक़े पर, संयमित रूप में ही सही, प्रकट भी होती है। पर अंततः वह भी उसका शिकार होने से बच नहीं पाता। यही उसकी त्रासदी है। यह कहना अनावश्यक है कि यह त्रासदी ही इस कहानी का कथ्य है। मध्यवर्ग के ऊहापोह और उसकी जीवन-विडम्बना को उद्घाटित करना दरअसल कहानी का लक्ष्य भी है। इसलिये शुरूआत में कथानायक और जब्बरसिंह के बीच जो वर्गीय दूरी दिखाई दे रही थी, वह बाद में मिट जाती है। इस दूरी को कथानायक परिस्थितियों के दबाव में स्वयं पाट देता है और मुख्य पशु-चिकित्सक बनने के महारानी राज्यलक्ष्मी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है, जबकि जब्बरसिंह ने स्वयं यह पद हासिल करने के लिए ही योजना बना कर उसे महारानी से मिलवाया था। जब स्थितियाँ बदल जाती हैं तो कथानायक उससे फ़ायदा उठाने में आगे-पीछे नहीं सोचता। यहीं से उसका वर्गान्तरण शुरू होता है जो दरअसल उसकी मध्यवर्गीय जीवन की स्वाभाविक चारित्रिक दिशा हैै। अब वह जब्बरसिंह की इच्छा और अनुरोध से नियंत्रित, उसकी स्वार्थपूर्ति का निरीह साधन नहीं, उसका प्रतिस्पर्द्धी है, उसे धकिया कर आगे बढ़ जाता है।


                          मगर मध्यवर्गीय जीवन की इस  विडम्बनापूर्ण परिणति को उद्घाटित करने के बाद कहानी पूरी नहीं हो जाती। वह एक वृहत्तर लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है और सामाजिक तंत्र में शोषण की प्रक्रिया की पड़ताल पर एकाग्र हो उठती है। कथाकार ने कामधेनु के मिथक का इस्तेमाल इसी उद्देश्य से किया है। फिर अंत में उसने मध्यवर्गीय व्यक्ति की ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना’ (मुक्तिबोध के शब्द) की तरफ़ संकेत करने के लिए कथानायक के आत्मद्वंद्व को महारानी राज्यलक्ष्मी के पूर्ववर्त्ती मुख्य चिकित्सक के जीवन की  परिणति में निहित सांकेतिकता और उसकी ही तरह कथानायक के भी आख़िरकार पागल हो जाने की नियति को फेंटेसी के माध्यम से रचा है। ज़ाहिर है, यह कहानी दमनकारी सामाजिक व्यवस्था में मध्यवर्ग के सम्वेदनशील नागरिक की त्रासद विडम्बना की ओर गहराई से इशारा करती है। 


                         निस्संदेह यह नया विषय नहीं है। मुक्तिबोध का समूचा लेखन प्रायः इसी विषय पर एकाग्र है। डॉ.  भारद्वाज दरअसल मुक्तिबोध की कहानी ‘पक्षी और दीमक’ के कथानायक का ही चारित्रिक प्रतिरूप है, जो भगवा खद्दरधारी शख़्स के सामने बौना पड़ जाता है और उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ अपनी राय तक व्यक्त नहीं कर पाता। वह उस पक्षी की तरह है जो अपने पंखों से, अपनी विवेक-चेतना से क्रमशः वंचित होता चला जाता है। वह दरअसल ‘सतह से उठता आदमी’ है। मुक्तिबोध  के काव्य-संसार में तो मध्यवर्ग की विवेक-चेतना के झकझोर देने के अनेक प्रसंग हैं। उनका चरितनायक कहीं एक अजाने अपराध-बोध से ग्रस्त हो कर मनोविक्षेप का शिकार हो उठने की हद तक अपने मनोलोक का असहाय बन्दी है। आत्मसंशय और गहरे नैतिक ऊहापोह के भँवर से निकलने  के तनाव में  पागलपन के प्रतीक या ब्रह्मराक्षस-सरीखे मिथक के भीतर वह अपने आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति पाता है। मगर  मनोलोक की प्राचीरों को तोड़ कर सजग-सतर्क अवस्था में वह जनक्रांति की सम्भावना और उसमें मुक्ति का स्वप्न देखता है। ‘कामधेनु’ कहानी भी कमोबेश मुक्तिबोधीय उपकरणों से रची गयी जान पड़ती है।


                            रमेश उपाध्याय ने कथात्मक वास्तविकता को पुरअसर तरीक़े से रचने के लिये मिथक और उसकी प्रतीकात्मकता का उपयोग किया है। कामधेनु की उत्पत्ति और राजा विश्वामित्र द्वारा महर्षि वशिष्ठ से उसका बलात अपहरण किये जाने पर अपनी मुक्ति के लिए अपनी हुंकार से पह्लव,यवन, शक, काम्बोज म्लेच्छ, हारीत और किरात जातियों के सहस्रों वीर योद्धा उत्पन्न कर विश्वामित्र की समूची सेना का संहार कर डालने के पौराणिक प्रसंग के निहितार्थ पर ग़ौर किया जाना चाहिए। पौराणिक कामधेनु की प्रतिरोध-वृत्ति के समानांतर इस कहानी के आख्यान में महारानी राज्यलक्ष्मी की कामधेनु भी पूजा के नाम पर अपना अबाध दोहन किये जाने से और बुरी तरह सताए जाने के बावजूद महारानी की मनोकामना पूर्ण करने से इनकार करती है। यह उसका मूक विद्रोह है। कहानी में इसे मौजूदा समय में पूंजीवादी जनतंत्र के भीतर जनता के शोषण और उसके प्रतिरोध के रूप में अर्थान्तर कर पढ़ा जा सकता है। इसकी पुष्टि अख़बार में छपी कामधेनु स्टेट की उस ख़बर से भी होती है, जिसके मुताबिक स्टेट के एक भाग में पकड़े गए क्रांतिकारियों में वही यवन, शक, काम्बोज, म्लेच्छ, हारीत और किरात शामिल थे। जन-प्रतिवाद का यह प्रसंग कुशलता के साथ और सांकेतिक ढंग से कहानी में विन्यस्त किया गया है। 

     

                      कथानायक की त्रासदी यह है कि दमन-शोषण के इस समूचे दुष्चक्र में भागीदार होने की नियति उसे भीतर तक कचोटती है और गहरा अपराध-बोध पैदा करती है। हालात से समझौता करने और प्रतिरोध की हूक उठने के बीच तनाव के प्रबल आघात से क्षत-विक्षत उसकी अंतश्चेतना अंततः एक तरह के मनोविक्षेप में, हैल्युुसिनेशन-जैसी स्थितियों में शरण लेती है। कामधेनु के सामने नायक का असम्बद्ध, अतार्किक और असंगत आत्मालाप मौजूदा सामाजिक तंत्र के भीतर व्यक्ति की विफलता और व्यर्थता की तीव्र अभिव्यक्ति है। इस कहानी को समकालीन व्यवस्था तथा उसमें मनुष्य की गति और नियति के रूपक के तौर पर भी पढ़ा जा सकता है।


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