बुधवार, 15 दिसंबर 2021

छत्तीसगढ़ी खेल गीत

 फुगड़ी


गोबर दे बछरू गोबर दे....चारो खुट ला लीपन दे.. चारो देरानी ला बइठन दे......

अपन खाते गुदा गुदा मोला देथे बीजा बीजा....

ये बीजा ला का करहु रही जाऊ तिजा..

तीजा के बिहान दिन घरी घरी लुड़गा हेर दे भौजी कपाट के खिला....

एक गोड मा लाल भाजी एक गोड मा कपूर कतेक ला मानो में देवर ससुर

फुगड़ी रे फू फू फुगड़ी रे.....


सोमवार, 1 नवंबर 2021

 







एक स्मृति-राग की तरह

रमेश चंद्र शाह की कहानी 'जानकी'




रमेशचंद्र शाह की कहानी 'जानकी' अपनी दुर्लभ सादगी और सहजता में एक अकुंठ-निष्कलुष मन की भीतरी ताहों में संगम संवेगों की मजबूती को भव्यता वाला मार्मिक आख्यान है। यह आख्यान कहानी को यथार्थ की तरह समाजशास्त्रीय समझ के दायरे से मनुष्य के अंतः संसार में खींचा गया है। यहां सामाजिकता की रुढ़ि और आस्थाओं का सुझाव कर कस्बे के रिश्तों की निश्चल इंटरनैशनल और उनके बीच विकसित की गई दोस्ती का वृत्तांत बनाया गया है, उनकी प्रतिभा गहरी अनुराग और मानवीय संस्कृति में है। सामाजिक संबंधों के यांत्रिक घटित होने की प्रक्रिया में आज जब हमारा क़स्बाई और ग्रामीण परिवेश भी व्यक्ति और व्यक्ति के बीच पसरती नमूने और निस्पृहता की चोटी में है, धीरे-धीरे-धीरा लुप्त हो रहा है वह मानवीय राग को यह कहानी विरासत में मिलती है, जो वास्तविक जीवन से अब स्मृतियों की ओर खिसकती जा रही है। बाल्यकाल के तीव्र मनोवेग और कशोर्य की वय-संधि की ओर संक्रमणशील मन के भीतर उठती तरंगों को और उसके बीच धीरे-धीरे पकते भावात्मक संसार को यह यथार्थता के साथ खोलती है।


                                  कहानी की शुरुआत बचपन के दिनों में लड़कियों के प्रतियों के मन में स्वभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले विपरीतलिंगी आकर्षण के साथ होती है। वाचक का संकेत है कि बाल-वय के कथानायक में यह कुछ ऐसी अनोखी बात को आकर्षित करती है कि आखिर क्यों वह लड़कियों के बीच जाने पर खिलखिलाती है और बच्चों के साथ होने लगती है। पिछवाड़े में वह बालकों के साथ अपने बिश्नोई बनाना चाहता था, लेकिन उसके बूटे से बाहर की बात थी। वह अपनी बातों से लड़कियों को प्रभावित करता था, लेकिन लड़के उसके समान गुण के कारण उसे अधिक पसंद नहीं करते थे, हालाँकि उसका किसी से झगड़ा नहीं होता था। स्कूल में सभी उसे पसंद करते थे। वह सबके बीच एक आदर्श लड़का समझा जाता था, लेकिन अपने से छोटी उम्र के लड़के से झगड़ा हुआ और उसके हाथों सरे-बाजार पिट जाने के बाद वह आत्मग्लानि से महीनों तक नहीं मिला। ऐसी ही एक कहानी है एक बच्चे के अंतर्मन की गुत्थियों को पकड़ने की कोशिश शुरू होती है। उसे दुनिया भर में अपनी कमर का पता लगाने के लिए लगता है। ग्लेनी-बोध से प्राप्त करें और अपनी कमतरी को दूर करने के लिए व्यायाम और योग के अभ्यास से शारीरिक बल प्राप्त करने की कोशिश करें और स्थायित्व की तलाश करें, लेकिन इसमें भी असफलता है। सुबह जंगल की सैर में जाना और प्रकृति के सौंदर्य को निहारना शुरू हुआ। इस तरह वह एकांत प्रेमी हो गई। 

                              जंगल और पहाड़ में भटकते हुए उसने सोचा कि पहाड़ की चोटी का नाम बांदी देवी या कसारा देवी आदि क्यों है? उन्हें लगता है कि लड़कियां भी सभी देवियों की तरह हैं -खासकर तब जब वे मुस्कुराती हैं, मोहिनी देवियों की तरह या बगल वाली जानकी की तरह। जानकी उसे बहुत अच्छी लगती है। वह अपने पांचवे साल में बड़ी मोहिनी को तो दे गया लेकिन जानकी को देखने के बाद भी उसे ऐसा नहीं लगा।


                                     फिर एक दिन जानकी से उसकी दोस्ती खत्म हो गई। कहानी में उनकी दोस्ती और गहरे रिश्ते के विविध प्रसंगों का जिक्र किया गया है। धीरे-धीरे-धीरे-धीरे एक मासूम-सी आस्था में ये कलाकारी हो गई। बन्दीदेवी की सायर पर जंगल में अपने और जानकी के परिवार के जाने और उन दोनों के पीछे जाने पर उन्हें जानकी के साथ बन्दी ने बेतरह अपनी गिरफ़्तार में ले लिया। उसे चारों तरफ जानकी-ही-जानकी दिखाई देती है। उन्हें जानकी साक्षात् बन्दीदेवी जान मन्दिर।

 

                                    जानकी के सान्निध्य के सम्मोहन में डूबे कथानायक के प्रति उनकी छोटी बहन लीला की कहानी का प्रसंग का उल्लेख है। जानकी से कथानायक के बगल में, रोज रात में दुकान बंद करते समय दोनों का खुसुर-पुसुर करना लीला को नहीं सुहाता। जैसे कहीं भी उसके मन में स्वाभाविक स्वभाव पठथ रही हो। यह बालसुलभ चाहत है। लेकिन कथानायक न जुकान दुकान बंद करने में रोज जानकी की मदद करता है और यह सैलून स्टूडियो तक पहुंचता है। फिर जानकी के विवाह की चर्चा हो रही है। मौलवी की सभी लड़कियों की शादी हो रही है। जानकी की शादी तय नहीं हो रही। बात होती है, पर बन नहीं रिज़ॉर्ट की। सहसा एक दिन जानकी के लिए रानीखेत वालों का रिश्ता आने की बात से डर गया न आरोपियों को डेट किया गया और बेहद व्याकुल क्षण में जानकी से कहा गया - 'जानकी, तू चलेगी तो मैं क्या जमा करूंगी? तू मेरे साथ ही ब्याह कर ले, जानकी।' 


                                       कथानायक के भीतर घुमड़ती छोटी-छोटी तरंगों के अनुरूप हो कर उद्दाम लहर में अकस्मात उठा यह क्षण जब प्रकट हुआ तो उसने अपने अस्तित्व को झकझोर दिया। उसका अपना मनो उस मर्म-क्षण में संपूर्णतः एकाग्र हो गया। यह उनकी अंतःस्थल से उठी अकुंठ कॉल थी। जानकी भी इस महासागरीय स्थिति से अचचाचा हो गई। उसकी दृष्टि तेज़ हो गई। लड़के को नहीं पता कि उसके बाद क्या हुआ। 

    वह अपने इनसाइड होमहाउस में शामिल हो गईं। जानकी की 'स्तब्ध-विचित्र छवि' ने उन्हें इस कादर मनोदैहिक रूप से अचदित कर दिया कि उनका गहरा प्रभाव मुक्त न हो सका। उसके मन में ग्लानि थी और उसका देह तप रही थी। यह मनोदैहिक ताप था। अकस्मात् संगत उस क्षण के स्थिर अध्याय को वह ध्यान में नहीं रख सकता। जानकी के प्रति भी अब वह सहज नहीं है।

   

                    

 ना वृद्धाश्रम का प्रत्यक्ष वर्णन करने की साधारण कथाकार ने यहां दुर्लभ या अटकल की कथा युक्ति के रूप में विघ्नधाता का बोध कराया है। इस घटना के बाद क्या हुआ? ऐसा महसूस नहीं हुआ - इसके लिए नाम दिया गया है कि स्टूडियो स्टूडियो जैसा दिखता है, फिर अंत में पूछा गया - 'क्या यह स्टूडियो है।

    इसके बाद कथाकार ने जो विवरण दिया है, उसमें उल्लेख किया गया है कि पूरी कहानी पुरानी यादों में डूबी हुई है। अंत तक की कहानी वर्तमान में प्रचलित है लेकिन अंतिम अध्याय में सहसा पाठकों को पता चलता है कि सभी कुछ कथानायक के स्मृति-संसार में हैं। यह फ़्लैशबैक मॉडल पद्धति का अद्वितीय उपयोग है। आम तौर पर कुछ इस तरह से किया जाता है कि शुरुआत में वर्तमान सर्वोच्च पद के नाम से जाना जाता है, फिर समय की कहानी कही जाती है। लेकिन यहां अंतिम नामकरण के रूप में जाना जाता है। वर्तमान केंचुल का छोड़ कर अतीत में प्रकट होना होता है। कथा-तकनीक की दृष्टि से यह विलक्षण प्रयोग है। फिर आगे भी अतीत के ब्यौरे हैं। न उज़ की मानस स्थिति का और उसके भीतर के ग्लेनी-बोध की प्रत्यक्ष शैली का वर्णन है और यह भी उल्लेख किया गया है कि किस तरह उसकी बाद में बीमार न देखने वाली जानकी आई, उसके मिज़ाजपुर्सी की उसके से दर्शन में फुसुसाकर जिस व्याकुल मनुहार के साथ धीरे से कहा गया था - 'आना हाँ', उसकी किताब में लिखा था कि जानकी दादी ने उसे फिर से माफ कर दिया है। यहां पहली बार न धनु के मन में जानकी के लिए दोस्त शब्द आया।

    क्या ऐसा नहीं लगता कि जानकी के इस 'आना हां' में गुलेरी की कहानी 'उसने कहा था' के 'तेरी कुदामाई हो गई'-जैसी गहरी व्यंजना से एक निश्चित वाक्य की सांकेतिकता भी निहित है? लहनासिंह के चुहल-भरे कथन में एक अमूर्त संबंध का सूक्ष्म बोध और निश्चल प्रेम की कुल कॉल झलक मारती है।

    इस वाक्यांश का अर्थ-संकेत अंततः तब होता है जब चालीस बार बधेड़ न उगे को अचानक जानकी के ब्रह्मलीन रह जाने की जानकारी मिलती है और वह विचार करता है - 'इसमें उसका क्या सुझाव है?' फिर भी वह जाने क्यों उस रात करवटें बदल रही थी और जब जानकी से जिज्ञासा हुई तो जानकी के मुँह से उसे वही कहा गया - "आना, हाँ।" तब चालीस की अंगूठी की अंगूठी को पल-भर में ढहा दिया गया और उसके अतीत को सीधे वर्त्तमान की नोंक में एकाग्र हो उठा लिया गया। एक अजीब-से-अपराध-बोध से उद्घाटित कथानायक के मर्म को भेदता हुआ यह वाक्यांश था - चालीस वृहस्पति की विस्मृति को झकझोरता हुआ, और जानकी के भीतर चालीस वृहस्पति से सिपचती पीड़ा को न निगलता हुआ शामिल हुआ।

                                      इस वाक्यांश की पुस्तक मर्मभेदी चौधरी को महज एक रहस्यमयी अंतरिक्ष रचना के प्रयास के लिए जाना जा सकता है। कथाकार यहां किशोर किशोर बच्चों के अंतर्लोक में समुद्र तट प्रेक्षक की तरह दाख़िल हो कर सम्वेदनशील तारिके से उनका अध्ययन करता है। मानव-व्यवहार की वैश्वीकरण और उसके निहित अनंत रहस्य को समझने के प्रयास से यह कहानी हमारी समझ में बहुत कुछ नया है। यही उसकी सार्थकता है।


                              यह कहानी एक स्मृति-राग की तरह उठती है और पाठक के मन को अद्भुत रूप से प्रभावशाली बनाती है।

रविवार, 31 अक्टूबर 2021






मनुष्य की गति और नियति का रूपक


 रमेश उपाध्याय की कहानी कामधेनु पर एक टिप्पणी



 रमेश उपाध्याय की कहानी ‘कामधेनु’ सत्ता द्वारा पोषित शोषण के दुष्चक्र में उसकी कुटिलता, निर्ममता और उसके विरुद्ध जनता के मूक प्रतिरोध के साथ-साथ मध्यवर्ग के नैतिक स्खलन का आख्यान है। कहानी मध्यवर्गीय कथानायक की आत्मचेतना को उसके परिवेश और जीवन-स्थितियों से मिल रही उन चुनौतियों के प्रत्यक्ष वर्णन के साथ शुरू होती है, जो उसे निरंतर नैतिक असमंजस का शिकार बनाए रखती हैं, फिर अंत में एक मिथकीय-रूपकात्मक आयाम हासिल कर समकालीन वास्तविकता के चरित्र और उसके भीतर सत्ता की निर्मम उपस्थिति को एक फंतासी के माध्यम से विश्लेषित करने लगती हैं। मिथक और वस्तुगत यथार्थ के परस्पर अन्तर्निबद्ध आयामों में समकालीन वास्तविकता को रूपायित करते हुए यह कहानी शिल्प के स्तर पर भी प्रयोग करती है : उसके कथात्मक विन्यास में कल्पना और वास्तविकता के विलक्षण संयोजन को सहज ही लक्ष्य किया जा सकता है।


                   ज़ाहिर है, यहाँ आख्यान यथार्थ और कल्पना के दो भिन्न स्तरों पर घटित होता है। लेकिन अपनी परिणति में यथार्थ मानो पिघल कर अन्ततः एक कल्पलोक में समा जाता है, जहाँ आख्यान का वास्तविक मर्म उद्घाटित होता है। कहानी के पूर्वार्द्ध में कथानायक का आत्मद्वंद्व उसके यथार्थपरक अनुभव के ब्यौरों में— प्रथम पुरुष  द्वारा कथावाचन के रूप में— प्रस्तुत किया गया है, जबकि परिस्थितियों के दबाव में  आख़िरकार आत्म-समर्पण के लिये विवश होकर और नैतिक रूप से स्खलित हो कर वह उत्तरार्द्ध में जब एक फंतासी में दाख़िल होता है तो जैसे व्यवस्था की चालाकी और क्रूरता के सामने ख़ुद को अपनी आत्मा के अंधकार में, एक भयावह नैतिक शून्य में असहाय पाता है। इस प्रक्रिया में नायक का अंतर्द्वंद्व मनोगत धरातल पर पहुँच कर स्वैरकल्पित वास्तविकता में विसर्जित हो जाता है। यह कहानी उसके प्रत्यक्ष अनुभव-संसार और उसके अन्तर्लोक के दो क्रमिक स्तरों पर घटित होती है।


               कथानायक डॉ. भारद्वाज, जो स्वयं कहानी का वाचक भी है, सामान्य निम्नमध्यवर्गीय परिस्थितियों से घिरा, पेशे से पशुचिकित्सक है। अपने पेशेवर जीवन में वह ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ है। उसके भीतर बेहतर जीवन-स्तर हासिल करने की स्वाभाविक आकांक्षा तो है, उसके लिये वह एक योजना भी बनाता है जिसे वह अपने मित्र और सहकर्मी जब्बरसिंह की मदद से साकार करना चाहता है, लेकिन ज़रूरी न्यूनतम संसाधनों के अभाव में, ख़ास तौर पर सीमित आर्थिक स्रोतों के कारण, वह अपने सपने पूरे कर नहीं पाता। दूसरी ओर, अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति के चलते उसके द्वारा सुझाई योजना को उसे भनक लगे बिना जब्बरसिंह मूर्त्त रूप देकर एक पॉश कॉलोनी में अपना निजी क्लीनिक खोल लेता है, पैसे कमाने लगता है और नौकरी छोड़ देता है। फिर धीरे-धीरे तरक़्क़ी और आर्थिक संपन्नता के रास्ते पर सरपट दौड़ते हुए एक ऐसे मुकाम पर पहुँचता है  जहाँ क़ामयाबी मानो उसके क़दम चूमने लगती है, मगर दूसरी ओर उसकी अंतरात्मा मर चुकी है;  फ़रेब और मक्कारी के दुष्चक्र में वह दूसरों को, अपने मित्र यानी कथानायक को भी, घेरने से परहेज नहीं करता। जब्बरसिंह के अनुनय-विनय या मित्रता के दबाव के चलते या थोड़े-से पैसे के लोभ में उसके लिये छोटे-छोटे काम करने को कथानायक हर बार तैयार हो जाता है।  लेकिन अपनी ईमानदारी को बचाए रखने की जद्दोजहद में आख़िरकार कथानायक ने जब्बरसिंह के प्रलोभनों के आगे कब हथियार डाल दिया, उसे पता ही नहीं चलता; वह  उस नैतिक स्खलन की चपेट में आ गया होता है, जिससे बचने की कोशिश में वह लगातार आत्मसंघर्ष से गुज़र रहा था। 


                         अपनी महत्त्वाकांक्षा के रथ पर सवार जब्बरसिंह न केवल उच्चवर्ग के भीतर पैठ बना चुका है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से वह स्वयं उच्चवर्ग में शामिल हो चुका है। जब्बरसिंह का चरित्र मध्यवर्ग में सामान्य रूप से पायी जाने वाली महत्त्वाकांक्षा और उसके चलते उच्चवर्गीय भद्रलोक में दाख़िल होने की लालसा का प्रतिनिधान करता है। वर्गारोहण की यह प्रवृत्ति, कहने की आवश्यकता नहीं कि आज मध्यवर्ग में अत्यंत संक्रामक रूप ले चुकी है।  उसका बैंडवैगन प्रभाव समाज मे स्पष्ट दिखाई देता है। कथानायक भी अपनी समूची नैतिक सम्वेदनशीलता और मध्यवर्गीय आत्मसंकोच के बावजूद इससे अछूता नहीं है; उसके भीतर एक दबी-कुचली आकांक्षा के रूप में वह कहीं-न-कहीं मौजूद है, जो मौक़े पर, संयमित रूप में ही सही, प्रकट भी होती है। पर अंततः वह भी उसका शिकार होने से बच नहीं पाता। यही उसकी त्रासदी है। यह कहना अनावश्यक है कि यह त्रासदी ही इस कहानी का कथ्य है। मध्यवर्ग के ऊहापोह और उसकी जीवन-विडम्बना को उद्घाटित करना दरअसल कहानी का लक्ष्य भी है। इसलिये शुरूआत में कथानायक और जब्बरसिंह के बीच जो वर्गीय दूरी दिखाई दे रही थी, वह बाद में मिट जाती है। इस दूरी को कथानायक परिस्थितियों के दबाव में स्वयं पाट देता है और मुख्य पशु-चिकित्सक बनने के महारानी राज्यलक्ष्मी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है, जबकि जब्बरसिंह ने स्वयं यह पद हासिल करने के लिए ही योजना बना कर उसे महारानी से मिलवाया था। जब स्थितियाँ बदल जाती हैं तो कथानायक उससे फ़ायदा उठाने में आगे-पीछे नहीं सोचता। यहीं से उसका वर्गान्तरण शुरू होता है जो दरअसल उसकी मध्यवर्गीय जीवन की स्वाभाविक चारित्रिक दिशा हैै। अब वह जब्बरसिंह की इच्छा और अनुरोध से नियंत्रित, उसकी स्वार्थपूर्ति का निरीह साधन नहीं, उसका प्रतिस्पर्द्धी है, उसे धकिया कर आगे बढ़ जाता है।


                          मगर मध्यवर्गीय जीवन की इस  विडम्बनापूर्ण परिणति को उद्घाटित करने के बाद कहानी पूरी नहीं हो जाती। वह एक वृहत्तर लक्ष्य की ओर उन्मुख होती है और सामाजिक तंत्र में शोषण की प्रक्रिया की पड़ताल पर एकाग्र हो उठती है। कथाकार ने कामधेनु के मिथक का इस्तेमाल इसी उद्देश्य से किया है। फिर अंत में उसने मध्यवर्गीय व्यक्ति की ‘अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना’ (मुक्तिबोध के शब्द) की तरफ़ संकेत करने के लिए कथानायक के आत्मद्वंद्व को महारानी राज्यलक्ष्मी के पूर्ववर्त्ती मुख्य चिकित्सक के जीवन की  परिणति में निहित सांकेतिकता और उसकी ही तरह कथानायक के भी आख़िरकार पागल हो जाने की नियति को फेंटेसी के माध्यम से रचा है। ज़ाहिर है, यह कहानी दमनकारी सामाजिक व्यवस्था में मध्यवर्ग के सम्वेदनशील नागरिक की त्रासद विडम्बना की ओर गहराई से इशारा करती है। 


                         निस्संदेह यह नया विषय नहीं है। मुक्तिबोध का समूचा लेखन प्रायः इसी विषय पर एकाग्र है। डॉ.  भारद्वाज दरअसल मुक्तिबोध की कहानी ‘पक्षी और दीमक’ के कथानायक का ही चारित्रिक प्रतिरूप है, जो भगवा खद्दरधारी शख़्स के सामने बौना पड़ जाता है और उसकी इच्छा के ख़िलाफ़ अपनी राय तक व्यक्त नहीं कर पाता। वह उस पक्षी की तरह है जो अपने पंखों से, अपनी विवेक-चेतना से क्रमशः वंचित होता चला जाता है। वह दरअसल ‘सतह से उठता आदमी’ है। मुक्तिबोध  के काव्य-संसार में तो मध्यवर्ग की विवेक-चेतना के झकझोर देने के अनेक प्रसंग हैं। उनका चरितनायक कहीं एक अजाने अपराध-बोध से ग्रस्त हो कर मनोविक्षेप का शिकार हो उठने की हद तक अपने मनोलोक का असहाय बन्दी है। आत्मसंशय और गहरे नैतिक ऊहापोह के भँवर से निकलने  के तनाव में  पागलपन के प्रतीक या ब्रह्मराक्षस-सरीखे मिथक के भीतर वह अपने आत्मसंघर्ष की अभिव्यक्ति पाता है। मगर  मनोलोक की प्राचीरों को तोड़ कर सजग-सतर्क अवस्था में वह जनक्रांति की सम्भावना और उसमें मुक्ति का स्वप्न देखता है। ‘कामधेनु’ कहानी भी कमोबेश मुक्तिबोधीय उपकरणों से रची गयी जान पड़ती है।


                            रमेश उपाध्याय ने कथात्मक वास्तविकता को पुरअसर तरीक़े से रचने के लिये मिथक और उसकी प्रतीकात्मकता का उपयोग किया है। कामधेनु की उत्पत्ति और राजा विश्वामित्र द्वारा महर्षि वशिष्ठ से उसका बलात अपहरण किये जाने पर अपनी मुक्ति के लिए अपनी हुंकार से पह्लव,यवन, शक, काम्बोज म्लेच्छ, हारीत और किरात जातियों के सहस्रों वीर योद्धा उत्पन्न कर विश्वामित्र की समूची सेना का संहार कर डालने के पौराणिक प्रसंग के निहितार्थ पर ग़ौर किया जाना चाहिए। पौराणिक कामधेनु की प्रतिरोध-वृत्ति के समानांतर इस कहानी के आख्यान में महारानी राज्यलक्ष्मी की कामधेनु भी पूजा के नाम पर अपना अबाध दोहन किये जाने से और बुरी तरह सताए जाने के बावजूद महारानी की मनोकामना पूर्ण करने से इनकार करती है। यह उसका मूक विद्रोह है। कहानी में इसे मौजूदा समय में पूंजीवादी जनतंत्र के भीतर जनता के शोषण और उसके प्रतिरोध के रूप में अर्थान्तर कर पढ़ा जा सकता है। इसकी पुष्टि अख़बार में छपी कामधेनु स्टेट की उस ख़बर से भी होती है, जिसके मुताबिक स्टेट के एक भाग में पकड़े गए क्रांतिकारियों में वही यवन, शक, काम्बोज, म्लेच्छ, हारीत और किरात शामिल थे। जन-प्रतिवाद का यह प्रसंग कुशलता के साथ और सांकेतिक ढंग से कहानी में विन्यस्त किया गया है। 

     

                      कथानायक की त्रासदी यह है कि दमन-शोषण के इस समूचे दुष्चक्र में भागीदार होने की नियति उसे भीतर तक कचोटती है और गहरा अपराध-बोध पैदा करती है। हालात से समझौता करने और प्रतिरोध की हूक उठने के बीच तनाव के प्रबल आघात से क्षत-विक्षत उसकी अंतश्चेतना अंततः एक तरह के मनोविक्षेप में, हैल्युुसिनेशन-जैसी स्थितियों में शरण लेती है। कामधेनु के सामने नायक का असम्बद्ध, अतार्किक और असंगत आत्मालाप मौजूदा सामाजिक तंत्र के भीतर व्यक्ति की विफलता और व्यर्थता की तीव्र अभिव्यक्ति है। इस कहानी को समकालीन व्यवस्था तथा उसमें मनुष्य की गति और नियति के रूपक के तौर पर भी पढ़ा जा सकता है।